हिमांशु साँगाणी
गरियाबंद | इंदागांव में हालात इतने “अच्छे” हैं कि बेरोजगारी चरम पर है, नशा सस्ते में उपलब्ध है, और प्रशासन आंखें मूंदे “मौन व्रत” धारण किए बैठा है। 25 दिनों में 3 मौतें हो चुकी हैं, 15 ने आत्महत्या की कोशिश की, लेकिन सरकारी नीतियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। हां, “बैठकें” जरूर हो रही हैं, “चिंता व्यक्त” की जा रही है, और “भविष्य में समाधान निकालने” की घोषणाएं भी जारी हैं।
Pairi Times 24×7 की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि गांव में आखिर क्या चल रहा है – और क्यों सरकार सिर्फ दर्शक बनी बैठी है।

50 रुपये में शराब, लेकिन रोजगार के लिए “मंथन जारी”
गांव के युवा सुबह उठते हैं, जंगल जाते हैं, महुआ,तेंदुपत्ता चार और कई तरह के वनोपज इकट्ठा करते हैं, और फिर उन पैसों से शाम को “स्पेशल एडिशन” शराब खरीदते हैं। यहां देसी शराब में धतूरा, तंबाकू और जाने क्या-क्या मिलाया जाता है, ताकि नशा और तेज हो!
सरकारी योजनाओं की बात करें तो बेरोजगार युवाओं के लिए रोज़गार नहीं, लेकिन “आसान उपलब्ध” शराब का सिस्टम पूरी मजबूती से काम कर रहा है। आखिर सरकार जनता को “बेहतर सुविधाएं” देने के लिए ही तो बनी है, है ना?
घर में तनाव, प्रशासन की शांति और मौतों की “आशंका”
- 1 मार्च: गजेंद्र यादव (45) ने फांसी लगा ली। उनके पिता शराब के आदी थे और रोज झगड़ा करते थे।
- 16 मार्च: कमल यादव (20) ने जान दे दी, क्योंकि गुटखा खाने की लत पर घर में विवाद हो गया था।
- 18 मार्च: चंद्रशेखर यादव (19) ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि वह अपने दोस्त की मौत के सदमे में था।
इस तरह की मौतें कोई नई बात नहीं हैं। पिछले 5 सालों में 15 लोग जान दे चुके हैं, लेकिन प्रशासन अब तक “विचार-मंथन” में ही व्यस्त है।
प्रशासन की नई योजना: चिंता व्यक्त करिए, बयान दीजिए और घर जाइए!
मौतों की खबर सुनकर प्रशासन ने फौरन “तेज कार्रवाई” की – यानी अफसरों ने दौरा किया, कुछ तस्वीरें खिंचवाईं, और गांव वालों को “नशे से दूर रहने की सलाह” देकर चलते बने।
लेकिन ठोस काम?
- न नशा मुक्ति केंद्र खुला, न कोई हेल्थ वेलनेस प्रोग्राम शुरू हुआ।
- युवाओं के लिए कोई रोजगार योजना नहीं, लेकिन शराब की दुकानें चालू हैं।
- स्कूली बच्चों के लिए कोई करियर गाइडेंस नहीं, लेकिन गिलास और गुटखा की बिक्री बेरोकटोक जारी है।
यानी, सरकार का संदेश साफ है – तुम्हारी जिंदगी की कीमत हमारे प्रेस नोट से ज्यादा नहीं है!
गांव वालों ने खुद संभाली कमान, प्रशासन से ज्यादा सक्रियता दिखाई!
जब सरकारी तंत्र सिर्फ रिपोर्ट तैयार कर रहा था, तब गांव के बुजुर्गों और जनप्रतिनिधियों ने खुद मोर्चा संभाल लिया।
- रातभर जागरण शुरू हुआ, ताकि कोई और आत्महत्या न कर सके।
- गांव के कोटवार से शराबबंदी की घोषणा करवाई गई।
- उड़ीसा से आने वाली अवैध शराब की सप्लाई रोकने के लिए पुलिस में शिकायत दर्ज हुई।
गांववालों का साफ कहना है – “अगर सरकार हमारे बच्चों को नहीं बचाएगी, तो हमें ही कुछ करना होगा!“
अब भी सवाल बाकी हैं…
- गांव में नशा मुक्ति केंद्र कब खुलेगा – जब 10 और मर जाएं?
- युवाओं को रोजगार देने के लिए सरकार कब काम करेगी – जब पूरा गांव खाली हो जाएगा?
- प्रशासन की गहरी चिंता कब खत्म होगी – जब कोई अधिकारी खुद इस संकट में फंस जाएगा?
जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक सरकारी “प्रयास” जारी रहेंगे, गांव के युवा “नशे में खोते” रहेंगे, और Pairi Times 24×7 को ऐसी खबरें लिखनी पड़ेंगी। क्योंकि प्रशासन की फाइलों में “मृतकों की संख्या” भले ही बढ़ जाए, लेकिन सरकारी घोषणाएं कभी नहीं बदलतीं।