गरियाबंद में सरकारी खिलवाड़ 90 युवाओं को एक एक साल का कन्फर्मेशन देकर काम अच्छा रहने पर एक एक साल करके आगे बढ़ा दिया जाएगा कहा गया था । इस एग्रीमेंट का झांसा देकर 10 दिन में निकाला गया खुशबू यादव, इमरान कुरैशी समेत कई युवाओं ने सरकारी धोखे के कारण नौकरी छोड़ी। जानें धान खरीदी ऑपरेटरों के भविष्य पर कलेक्टर से सवाल।
गरियाबंद,छत्तीसगढ़ में धान खरीदी संकट के दौरान राज्य सरकार द्वारा युवाओं को दिए गए मौखिक आश्वासन अब गरियाबंद जिले में बड़े धोखे में बदल गए हैं। जिले के 90 धान खरीदी केंद्रों पर नियुक्त किए गए 90 इमरजेंसी ऑपरेटरों को, मात्र 10 दिन काम लेने के बाद, बिना किसी नोटिस या जिम्मेदारी के सिस्टम से बाहर कर दिया गया है। इन युवाओं में वे भी शामिल हैं जिन्होंने 3 से 5 साल पुरानी सुरक्षित नौकरी छोड़ दी थी।

गरियाबंद में सरकारी खिलवाड़ 3 से 5 साल की नौकरी छोड़ कर छोड़कर आए अब भविष्य अधर में
पूरे प्रदेश में हड़ताल के दौरान, गरियाबंद प्रशासन ने भी 90 केंद्रों के लिए नई भर्तियाँ कीं। इन युवाओं को 3 साल तक एग्रीमेंट बढ़ाने का आश्वासन दिया गया, जिसने कई सुरक्षित नौकरियों पर भारी पड़ गया।
- शिक्षिका से ऑपरेटर इमरान कुरैशी 10 हजार की अपनी शिक्षण नौकरी छोड़कर आए।
- NGO कर्मी का त्याग गोपी वर्मा ने 25 हजार की नौकरी ठुकराकर 18 हजार के एग्रीमेंट के लिए गृह ग्राम लौटे।
- नरेगा ऑपरेटर की बलि इसी क्रम में, देवभोग की खुशबू यादव भी प्रशासन के इस झांसे में आ गईं। वह पिछले 3 साल से नरेगा ऑपरेटर के पद पर कार्यरत थीं, जहाँ उन्हें हर माह 12 हजार मिलते थे। उन्होंने अपनी स्थायी नौकरी छोड़कर गौहरापदर मैनपुर धान खरीदी सेंटर में ऑपरेटर का पद संभाला यह सोचकर कि 3 साल का सरकारी एग्रीमेंट ज़्यादा सुरक्षित होगा।
15 नवंबर से 25 नवंबर तक, इन 90 युवाओं ने प्रशासन के लिए पसीना बहाया। हर युवा ने नौकरी छोड़ने के अलावा, कागज़ात और भागदौड़ में औसतन 7 हजार से 10 हजार तक का खर्च किया।
10 दिन की सेवा, फिर तत्काल आउट
लेकिन जैसे ही पुराने, हड़ताली ऑपरेटर काम पर लौटे, गरियाबंद प्रशासन ने मानवीयता की सारी हदें पार कर दीं। इन 90 युवाओं को बिना किसी नोटिस, बिना किसी क्षतिपूर्ति के, तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया। जबकि मौखिक गारंटी का इस्तेमाल युवाओं को उनकी पुरानी नौकरी छुड़वाने के लिए किया गया था। यह प्रशासनिक रवैया दिखाता है कि सरकारी ज़रूरत के लिए आम आदमी का जीवन कितना सस्ता है।
खुशबू यादव ने व्यथित होकर कहा, मैंने 3 साल की नरेगा की नौकरी, जो स्थायी थी, सिर्फ इस उम्मीद में छोड़ी कि 3 साल का सरकारी काम मिलेगा। अब 10 दिन काम लेने के बाद हमें हटा दिया गया। मेरे भविष्य का ज़िम्मेदार कौन है?
कलेक्टर के दफ्तर में 90 छले गए युवाओं का जमावड़ा
आज, गरियाबंद के ये 90 युवा अपने अंधकारमय भविष्य और टूटे हुए सपनों के साथ कलेक्टर के दफ्तर में खड़े हैं। वे राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन के दोहरे चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं:
- जब जरूरत थी आप पुरानी नौकरी छोड़ने को कहते हैं और 1 साल से शुरू कर 3 साल का सपना दिखाते हैं।
- जब जरूरत खत्म हुई आप बिना लिखित कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं।
इस घटना ने साफ कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में युवाओं का जोश और त्याग सिर्फ इमरजेंसी सर्विस के लिए एक सस्ता और अस्थायी विकल्प है।
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