संपादक पैरी टाईम्स 24×7 डेस्क गरियाबंद
आत्मसमर्पित माओवादियों ने गरियाबंद में 22 आत्मसमर्पित माओवादियों ने उल्लास नव भारत साक्षरता महापरीक्षा में लिया भाग जानें कैसे छत्तीसगढ़ की पुनर्वास नीतियों और कौशल विकास सिलाई प्लंबर ने बंदूक को कलम में बदला पढ़े पूरी ख़बर पैरी टाईम्स पर ।
गरियाबंद, वह ज़माना गया जब गरियाबंद के जंगलों में बंदूक की नली ही सब कुछ तय करती थी। अब यहाँ के पूर्व-माओवादियों ने एक नया, और शायद सबसे विस्फोटक, शस्त्र उठाया है कलम ।जी हाँ, यह कोई मज़ाक नहीं है! राष्ट्रव्यापी महापरीक्षा अभियान (उल्लास नव भारत साक्षरता कार्यक्रम) के तहत, गरियाबंद ज़िले में कुल 22 आत्मसमर्पित माओवादियों ने बाकायदा परीक्षा हॉल में बैठकर ज्ञान की परीक्षा दी है। यह दृश्य देखकर शायद ही कोई यकीन कर पाए कि एक समय ये लोग व्यवस्था को चुनौती दे रहे थे, और आज खुद छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीतियों के सामने सिर झुकाकर व्यवस्था के सबसे प्यारे अंग शिक्षा को गले लगा रहे हैं

आत्मसमर्पित माओवादियों का आइडियोलॉजी से अक्षर ज्ञान तक का सफ़र
इन 22 पूर्व-नक्सलियों का यह कदम किसी कठिनतम असाइनमेंट से कम नहीं है। प्रतिबंधित माओवादी संगठन को छोड़कर, समाज की मुख्यधारा में वापस आना और फिर 07 दिसंबर 2025 को होने वाली इस उल्लास महापरीक्षा में शामिल होना, यह दर्शाता है कि खुशहाल जीवन की अपील संघर्ष की अपील से कहीं ज़्यादा मजबूत है। एक तरह से, यह उनके लिए एक तरह का रिवर्स इंटर्नशिप है, जहाँ उन्होंने वर्षों तक जंगल की ‘रणनीति’ सीखी और अब उन्हें सिविल सोसाइटी की एबीसी सीखनी पड़ रही है।

बंदूक की जगह अब सिलाई मशीन और प्लंबर का औज़ार ।
लेकिन कहानी सिर्फ़ साक्षरता पर खत्म नहीं होती। छत्तीसगढ़ शासन की पुनर्वास नीतियाँ केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह सुनिश्चित कर रही हैं कि ये आत्मसमर्पित नागरिक अब किसी पर निर्भर न रहें।
अब जंगल में ‘भूमिगत’ होने के बजाय, ये पूर्व-नक्सली लाइवलीहुड कॉलेज गरियाबंद में ‘व्यवसायगत’ हो रहे हैं!
कौशल विकास योजना के तहत इन्हें सिलाई मशीन, वाहन चालक और प्लंबर का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ज़रा सोचिए, जो हाथ कभी हथियार उठाते थे, वे अब सिलाई मशीन चलाएंगे या नल फिट करेंगे यह परिवर्तन न केवल सकारात्मक है, बल्कि हमारे समाज के लिए एक ज़ोरदार संदेश है कि आत्मनिर्भरता की राह हमेशा खुली है।
भविष्य सरकारी योजनाओं के लाभार्थी
ज़िला प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में भी इन सभी पूर्व-माओवादियों को शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। यह एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे सकारात्मक सरकारी पहल किसी भी विचारधारा से ज़्यादा प्रभावी हो सकती है।
गरियाबंद में नक्सलियों की यह पहल एक सफलता की कहानी है, बंदूक के समाधान से ज़्यादा, ज्ञान, कौशल और आत्मसम्मान का समाधान हमेशा जीतता है। अब उम्मीद है कि ये 22 परीक्षा पास माओवादी, बाकी बचे हुए लोगों के लिए भी प्रेरणा का पाठ्यक्रम सेट करेंगे।