गरियाबंद वाले साहब का कुर्सी से फेविकोल वाला प्यार,तबादले के 16 दिन बाद भी नहीं छूट पा रहा वर्तमान पोस्टिंग का मोह, कलेक्टर भी दिख रहे मजबूर ।

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By Sangani

गरियाबंद वाले साहब का कुर्सी से फेविकोल वाला प्यार खनिज अधिकारी रोहित साहू के तबादले के 16 दिन बाद भी कुर्सी न छोड़ने पर मचा बवाल। क्या अवैध वसूली और कुर्सी मोह के कारण रुक रहा है ज्वाइनिंग? जानें प्रशासनिक आदेशों की उड़ती धज्जियां और कलेक्टर का इस मामले पर बयान को पैरी टाईम्स पर ।

गरियाबंद छत्तीसगढ़ में नई सरकार के आने के बाद सुशासन के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन गरियाबंद में कुछ शासकीय कर्मी इन दावों को ठेंगा दिखाते नजर आ रहे हैं। मामला खनिज विभाग का है, जहाँ उपसचिव श्रीकांत वर्मा द्वारा 8 दिसंबर को जारी स्थानांतरण आदेश को आए 16 दिन बीत चुके हैं, लेकिन मैदानी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आदेश में तत्काल प्रभाव से ज्वाइनिंग के निर्देश थे, मगर खनिज अधिकारी रोहित साहू शायद इस आदेश को पेंडिंग मोड में डालकर बैठे हैं।

​गरियाबंद वाले साहब का कुर्सी से फेविकोल वाला प्यार

गरियाबंद वाले साहब का कुर्सी से फेविकोल वाला प्यार विवादों से पुराना नाता और माफिया कनेक्शन की भी चर्चा

​यह पहली बार नहीं है जब खनिज अधिकारी सुर्खियों में हैं। अतीत में भी साहब पर रेत माफिया से कथित संबंधों के गंभीर आरोप लग चुके हैं। चर्चा तो यहाँ तक है कि खनिज माफियाओं के साथ उनकी जुगलबंदी के चर्चे गलियारों में आम रहे हैं। इसके अलावा, पूर्व में हुए कुछ घटनाक्रमों और विवादों के चलते भी वे लगातार सुर्खियों में बने रहे हैं। अब जब तबादला आदेश के बाद भी वे कुर्सी नहीं छोड़ रहे हैं, तो लोग पुराने विवादों को जोड़कर देख रहे हैं कि आखिर इस मोह के पीछे का असली राज क्या है?

कुर्सी का आकर्षण या चढ़ावे का जादू?

​प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर वह कौन सा चुंबकीय खिंचाव है जो साहब को नई पोस्टिंग पर जाने से रोक रहा है। सूत्रों के द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि जिले में अवैध खदानों और परिवहन में प्रति ट्रिप के हिसाब से कथित चढ़ावे का खेल चल रहा है। चर्चा है कि बिना रॉयल्टी के दौड़ने वाले हाईवा साहब के लिए कुबेर का खजाना साबित हो रहे हैं। विभाग के ही एक कर्मचारी अपने नाम न छापने की शर्त पर बतया की साहब मिला हुआ चढ़ावा न तो ऊपर पहुंचाते है और न ही नीचे बांटते है । इस मामले में एकला चलो की नीति पर कार्य करते है । हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और यह जांच का विषय है।

कलेक्टर का तर्क और प्रशासनिक पेच

​इस विलंब पर जब गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उईके से रोहित साहू के रिलीविंग को लेकर जानकारी ली गई, तो उन्होंने बताया कि रिलीवर के न आने के कारण उन्हें रिलीव नहीं किया जा रहा है। अब जनता यह समझ नहीं पा रही कि पहले अंडा आया या मुर्गी ? मतलब जब तक साहब कुर्सी खाली नहीं करेंगे, तब तक नया अधिकारी आएगा कैसे ? और जब तक नया आएगा नहीं, तब तक साहब जाएंगे नहीं यह सांप-सीढ़ी का खेल गरियाबंद की जनता बड़े चाव से देख रही है। सूत्रों की माने तो साहब मार्च अप्रैल तक गरियाबंद में कुर्सी कुर्सी खेलने के मूड में है

खनिज अधिकारी ने साधी चुप्पी

​इस पूरे मामले पर सच्चाई जानने के लिए हमने खनिज अधिकारी रोहित साहू से उनके मोबाइल फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया, ताकि वे अपना पक्ष रख सकें, परंतु उन्होंने कॉल रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा। साहब की यह चुप्पी कई अनसुलझे सवालों को जन्म दे रही है।

सूत्रों की जुबानी प्रति ट्रिप का गणित

​हवाओं में तैरती खबरों और सूत्रों के दावों की मानें तो रेत से ही प्रतिदिन 60 से 70 हजार की कमाई गिट्टी वाले वाहनों की अलग ?

  • ​अवैध खदानों से निकलने वाले प्रति हाईवा से कथित तौर पर एक निश्चित सेवा शुल्क वसूला जा रहा है।
  • ​गिट्टी के ओवरलोड और बिना परमिट वाले वाहनों के लिए भी मंथली पास सिस्टम की चर्चाएं जोरों पर हैं।
  • ​कहा जा रहा है कि इस सिस्टम की वजह से ही साहब का मन गरियाबंद से ऊब नहीं रहा है।
  • खदान से जुड़े एक सूत्र ने बताया है कि जब कोई अवैध खदान चलाने की मांग करता है तो साहब मोटा चढ़ावा तो लेते है मगर चेतावनी भी देते है कि अगर शिकायत होगी तो कार्रवाई भी करूंगा ।

ये आदेश सिर्फ कागजी शेर हैं?

​सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा सरकार के सुशासन में विभाग के उपसचिव के आदेश की कीमत महज एक कागज का टुकड़ा है? क्या एक अधिकारी की जिद के आगे पूरा प्रशासनिक अमला नतमस्तक है? गरियाबंद की जनता अब यह पूछ रही है कि साहब को इस कुर्सी से कब आजादी मिलेगी या फिर ये कुर्सी ही साहब को अपना परमानेंट एड्रेस मान चुकी है।

पैरी टाईम्स को साहब के पक्ष का इंतजार रहेगा…

​यह रिपोर्ट प्रशासनिक देरी और सार्वजनिक चर्चाओं पर आधारित एक विश्लेषण है। खबर में उल्लेखित माफिया कनेक्शन और भ्रष्टाचार के दावे पुरानी सुर्खियों और सूत्रों पर आधारित हैं, जिनकी हमारा पोर्टल पुष्टि नहीं करता है। संबंधित अधिकारी यदि अपना स्पष्टीकरण देना चाहें, तो उनका स्वागत है।

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