जज बोले कानून बदल गए हैं, अब जांच का तरीका भी बदलना होगा गरियाबंद में तीन नए कानूनों के दो वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यशाला में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गंगा पटेल और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट खुशबू जैन ने पुलिस अधिकारियों को डिजिटल साक्ष्य, समयबद्ध विवेचना और नए कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया पढ़ें पूरी खबर पैरी टाईम्स पर।
गरियाबंद कानून बनाना सरकार का काम है, लेकिन उसे सही तरीके से लागू कर आम नागरिक तक न्याय पहुंचाना न्यायपालिका और पुलिस की साझा जिम्मेदारी है। यही संदेश गरियाबंद में उस समय देखने को मिला, जब तीन नई आपराधिक कानून संहिताओं के सफल क्रियान्वयन के दो वर्ष पूरे होने पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में न्यायपालिका ने नेतृत्वकारी भूमिका निभाते हुए पुलिस अधिकारियों को नए कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन का व्यावहारिक पाठ पढ़ाया।

जज बोले कानून बदल गए हैं, अब जांच का तरीका भी बदलना होगा डिजिटल साक्ष्य और समयबद्ध विवेचना पर विशेष जोर
इस कार्यशाला में पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर सहित मुख्य अतिथि अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गंगा पटेल रहीं,उनके साथ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट खुशबू जैन, एडीपीओ शीतल दुबे, एडीपीओ विकास टोप्पो तथा एडीपीओ प्रवीण बेलोदिया ने नए कानूनों की बारीकियों और न्यायिक दृष्टिकोण पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। कार्यक्रम में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक करण कुमार उके, डीएसपी लितेश सिंह, एसडीओपी निशा सिन्हा, एसडीओपी ओम प्रकाश कुजूर, डीएसपी गरिमा दादर, डीएसपी गोपाल वैश्य, सभी थाना प्रभारी एवं विवेचक उपस्थित रहे।
तीन नई कानून संहिताओं के दो वर्ष पूरे होने पर न्यायपालिका ने पुलिस को दिए सटीक संदेश
कार्यशाला में सबसे पहले अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गंगा पटेल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बदलते समय में केवल पारंपरिक जांच पर्याप्त नहीं है। उन्होंने पुलिस अधिकारियों को डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को विधिसम्मत तरीके से संकलित करने, सुरक्षित रखने तथा न्यायालय में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मजबूत तकनीकी साक्ष्य ही न्यायिक प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय बनाते हैं।
इसके बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट खुशबू जैन ने नए कानूनों के तहत एफआईआर पंजीयन, गवाहों के बयान, जब्ती की कार्रवाई तथा विवेचना की समय-सीमा का कड़ाई से पालन करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि छोटी-सी प्रक्रियात्मक त्रुटि भी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, इसलिए विवेचना में कानूनी शुद्धता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
एडीपीओ शीतल दुबे, विकास टोप्पो और प्रवीण बेलोदिया ने अभियोजन के दृष्टिकोण से विवेचकों को केस डायरी, चार्जशीट, साक्ष्य संकलन और न्यायालयीन प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण व्यावहारिक सुझाव दिए, ताकि अदालत में प्रकरण अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किए जा सकें।
कार्यशाला का संदेश साफ था केवल केस दर्ज नहीं करना उसकी जाँच भी उच्चस्तरीय हो
अगर इस पूरी कार्यशाला को देखा जाए तो संदेश साफ था अब केवल केस दर्ज कर देना उपलब्धि नहीं, बल्कि अदालत में टिकने वाली जांच ही असली सफलता मानी जाएगी। यानी अब कानून की किताब बदलने के साथ-साथ जांच की कार्यशैली भी बदलनी होगी।
कार्यशाला का उद्देश्य नए कानूनों के क्रियान्वयन की समीक्षा करना, न्यायपालिका और पुलिस के बीच समन्वय मजबूत करना, विवेचकों की तकनीकी समस्याओं का समाधान करना तथा आम नागरिकों को त्वरित और प्रभावी न्याय उपलब्ध कराना रहा।
समापन अवसर पर पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर ने न्यायिक अधिकारियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि गरियाबंद पुलिस नई कानून संहिताओं का अक्षरशः पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने सभी थाना प्रभारियों और विवेचकों से आधुनिक, पारदर्शी और जनहितैषी पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाने का आह्वान किया। जब न्यायपालिका मार्गदर्शक बने और पुलिस सीखने को तैयार हो, तब कानून केवल कागजों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम नागरिक के लिए न्याय का मजबूत माध्यम बन जाता है।
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