विकास या विनाश ? गरियाबंद नेशनल हाईवे निर्माण में नियमों का श्राद्ध और जिले के बड़े अधिकारियों की आंखों के सामने ठेकेदार की मनमानी चरम पर ।

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By Sangani

विकास या विनाश गरियाबंद मुरुम कांड पंचायतों को ठेंगा दिखाकर तालाब खोदने की तैयारी, हाईवे निर्माण में हो रही बड़ी लापरवाही पढ़े पूरी ख़बर पैरी टाईम्स पर।

गरियाबंद जिला मुख्यालय में नेशनल हाईवे 130 सी का निर्माण अब विकास से ज्यादा विवादों’ का पर्याय बन चुका है। मुरुम के पुराने विवाद के बाद अब एक नया कारनामा सामने आ रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, नेशनल हाईवे में मुरुम डालने के लिए नया तालाब से 2 हजार घन मीटर मुरुम निकालने का मास्टर प्लान तैयार किया गया है। मज़ेदार बात यह है कि इस खेल में परमिशन के नाम पर केवल नगर पालिका की हरी झंडी ली गई है, जबकि उन पंचायतों को ठेंगा दिखा दिया गया है जिनकी जमीन और हक इस तालाब से जुड़े हैं।

विकास या विनाश

विकास या विनाश पंचायतों को दरकिनार कर अवैध राह तलाशने की कोशिश?

​तालाब से मुरुम निकालने के इस आवेदन ने कई प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि नया तालाब का दायरा केवल नगर पालिका तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पारागांव और आमदी पंचायत की भी हिस्सेदारी है। नियमतः किसी भी बड़े खनन के लिए संबंधित पंचायतों की एनओसी (NOC) अनिवार्य है। लेकिन यहाँ शॉर्टकट अपनाते हुए दो पंचायतों की परमिशन लेना मुनासिब नहीं समझा गया। क्या यह पंचायतों के अधिकारों का हनन नहीं है? या फिर ठेकेदार को भरोसा है कि रसूख के आगे पंचायत की आवाज दब जाएगी?

कलेक्ट्रेट के सामने एडवेंचर और एसडीओ का अपना संविधान

​एक तरफ मुरुम का यह कागजी खेल चल रहा है, तो दूसरी तरफ कलेक्ट्रेट के सामने धरातल पर मौत का जाल बिछा है। सड़क के दोनों ओर एक साथ गड्ढे खोदकर छोड़ दिए गए हैं, जिससे राहगीर अपनी जान हथेली पर लेकर चल रहे हैं। जब इस बारे में नेशनल हाईवे के एसडीओ जेपी कौशल से पूछा गया, तो उन्होंने नियमों की अपनी ही एक डिक्शनरी खोल दी। उनका कहना है कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि एक ही साइड गड्ढा करना है। शायद साहब की नजर में सुरक्षा बोर्ड और बैरिकेडिंग भी ऑप्शनल हैं, क्योंकि मौके पर ये कहीं नजर नहीं आते।

लापरवाही का हाईवे आँखों पर पट्टी बांधे बैठा प्रशासन

​बिना पंचायतों की अनुमति के मुरुम निकालने की तैयारी और सड़क पर बिना सुरक्षा इंतजामों के खुदाई, यह बताने के लिए काफी है कि गरियाबंद में हाईवे निर्माण सिस्टम की मिलीभगत से चल रहा है। कलेक्ट्रेट के सामने हो रही इस मनमानी पर अधिकारियों का मौन यह साबित करता है कि जनता की सुरक्षा और नियमों की मर्यादा विकास की इस कथित आंधी में उड़ चुकी है।

क्या गरियाबंद की जनता के लिए अधिकारियों नहीं कोई जिम्मेदारी?

कुल मिलाकर, गरियाबंद में नेशनल हाईवे का निर्माण किसी साहसिक यात्रा से कम नहीं है। कलेक्ट्रेट के सामने नियमों की इस अंतिम विदाई पर जिम्मेदार अधिकारियों का मौन यह साबित करता है कि ठेकेदार की मनमर्जी के आगे सिस्टम ने घुटने टेक दिए हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन किसी बड़े हादसे का फीता कटने का इंतजार कर रहा है या फिर इन गड्ढों में सुरक्षा के दो-चार बोर्ड लगाने की जहमत उठाएगा।

अधिकारी का वर्जन नियमों से बेरोकटोक

जल्द निर्माण पूरा करने के लिए दोनों ओर गड्ढे करना गलत नहीं है। हम गाइडलाइन के हिसाब से काम कर रहे हैं।

जेपी कौशल, एसडीओ, नेशनल हाईवे

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