गांधी मैदान व्यावसायिक परिसर निर्माण ‘पूर्व’ का मोह और ‘वर्तमान’ से द्रोह, खुद की लाइटें फ्यूज हुईं तो अब गौरव पथ के उजाले से चिढ़? विकास की राह में अतीत के भूतों का पहरा ।

Sangani

By Sangani

संपादक पैरी टाईम्स 24×7 डेस्क गरियाबंद

गांधी मैदान व्यावसायिक परिसर निर्माण की दुकान नीलामी को लेकर सीएमओ ने जारी किया स्थगन पत्र मगर कुछ ही घंटों में परिषद ने निर्माण को लेकर लगाई मुहर व्यावसायिक परिसर निर्माण को लेकर चल रही खींचतान और विरोधियों के दोहरे चरित्र की पूरी कहानी पैरी टाईम्स पर जानें क्यों जरूरी है यह कॉम्प्लेक्स ।

गरियाबंद की राजनीति में इन दिनों भूतकाल वर्तमान को डराने की कोशिश कर रहा है। जिन ‘पूर्व‘ सूरमाओं ने अपने दौर में जनता के करोड़ों रुपये बेकार की लाइटों और सूखे गार्डनों में होम कर दिए, आज उन्हें गौरव पथ पर सजती दुकानें अपनी विफलता का आईना लग रही हैं। सूत्र बताते हैं कि ये ‘पूर्व‘ दिग्गज पर्दे के पीछे से ऐसी डोर खींच रहे हैं कि प्रशासनिक अधिकारी भी परिषद के फैसले को भूलकर लेटर-लेटर का खेल खेलने लगे हैं। गजब ये है कि खुद की विरासत अधूरे निर्माण की है और सवाल ‘पूर्ण‘ होते विकास पर उठा रहे हैं गरियाबंद की सड़कों पर इन दिनों एक अजीब सा सस्पेंस थ्रिलर चल रहा है। यहाँ नायक और खलनायक की पहचान करना मुश्किल हो गया है क्योंकि जो लोग दिन के उजाले में विकास का विरोध कर रहे हैं, वही रात के अंधेरे में अपनी दुकान सेट करने में जुटे हैं। गौरव पथ व्यावसायिक परिसर का मुद्दा अब केवल ईंट और पत्थर का निर्माण नहीं रहा, बल्कि यह गरियाबंद की पुरानी बनाम नई राजनीति की जंग बन गया है।

गांधी मैदान व्यावसायिक परिसर निर्माण

गांधी मैदान व्यावसायिक परिसर निर्माण पूर्व का साया और सीएमओ का फास्ट फॉरवर्ड लेटर

​नगर पालिका के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मंत्री ,राजिम विधायक, भाजपा जिलाध्यक्ष, नगर पालिका अध्यक्ष और 14 पार्षद यानी पूरा लोकतंत्र विकास के पक्ष में खड़ा है, तो वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जिसके इशारे पर सीएमओ ने परिषद की गरिमा को दरकिनार कर निरस्तीकरण जारी कर दिया? आखिर इतनी जल्दबाजी क्या थी? क्या सीएमओ की कलम को पूर्व की यादों का सहारा मिल रहा है? परिषद के निर्णय को ताक पर रखकर जारी किया गया यह पत्र आज गरियाबंद के प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

आंदोलनकारियों की पॉकेट में नीलामी की रसीद

​जनता इस बात पर ठहाके मार रही है कि जो आंदोलनकारी उनके समर्थक इस प्रोजेक्ट को अवैध बता रहे थे,वो खुद और उनके ही घर के लोग नीलामी की कतार में सबसे आगे क्यों थे? उन्होंने नीलामी प्रक्रिया में दुकान खरीद कर खुद ही यह साबित कर दिया कि निर्माण में कोई खामी नहीं है। अगर प्रोजेक्ट गलत है, तो क्या उनका परिवार गलत चीज में निवेश कर रहा है? या फिर यह विरोध केवल दूसरों को दूर रखने का एक सियासी पैंतरा था?

संकल्प बनाम अधूरे पार्षदों की जलन

​नगर पालिका अध्यक्ष रिखीराम यादव ने साफ शब्दों में कहा है कि यह कॉम्प्लेक्स गरियाबंद के विकास के लिए एक वरदान है। 15 सौ रुपये के किराए पर दुकानें मिलने से उन किराया माफियाओं की नींद उड़ गई है जो वर्षों से शहर के व्यापार को अपनी मुट्ठी में रखे हुए थे। उन विपक्षी पार्षदों का विरोध भी समझ आता है, जिन्होंने खुद के ठेके तो आधे-अधूरे छोड़ दिए, लेकिन दूसरों के द्वारा किए जा रहे पूर्ण विकास को देख उन्हें जलन हो रही है।

​16 से 20 फरवरी की देर रात तक चली नीलामी प्रक्रिया एक ऐतिहासिक सफलता थी। गरियाबंद की जनता अब सोशल मीडिया के फर्जी लेटर्स और धोखे की शिकायतों को पहचान चुकी है। मंत्री और विधायक के समर्थन से चल रहा यह विकास रथ अब किसी पूर्व के रोड़े अटकाने से नहीं रुकने वाला।

युवाओं को धोखे में रखकर कराई गई शिकायत जानकारी लगते ही हुई वापस

पूरे ड्रामे में और मोड तब आया जब पता चला कि गरियाबंद कलेक्टर को दी गई शिकायत एक फर्जीवाड़े की बुनियाद पर खड़ी थी। सूत्रों के अनुसार, जिन दो युवाओं ने शिकायत पर हस्ताक्षर किए थे, उन्होंने खुद नगर पालिका को लिखित पत्र देकर यह कबूल किया है कि उन्हें अंधेरे में रखकर साइन कराए गए। यह साफ़ है कि जब विरोधियों के पास कोई ठोस आधार नहीं बचा, तो उन्होंने मासूम युवाओं के कंधों का इस्तेमाल अपनी राजनैतिक बंदूक चलाने के लिए किया।

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