गरियाबंद गौरव पथ दुकान नीलामी के विरोध के नाम पर “दोगली राजनीति” विरोध की मशाल थामे खुद नीलामी की कतार में खड़े हैं आंदोलनकारी ।

Sangani

By Sangani

संपादक पैरी टाईम्स 24×7 डेस्क गरियाबंद

गरियाबंद गौरव पथ दुकान नीलामी के नाम पर भ्रम फैला रहे विरोधियों का देखे दोहरा चेहरा ,विरोध करने वालों में दो नपा अध्यक्ष पद के थे दावेदार…उनमें से एक जो कर रहे थे विरोध,उन्हीं ने लगाई लाखों की बोली, वही एक विपक्ष के पार्षद जिनका गरियाबंद के विकास है अनोखा नाता..जानें 31 दुकानों की नीलामी से पालिका को मिले करोड़ों रुपये और रसूखदारों की दुकान की भूख का पूरा सच पैरी टाईम्स पर ।

गरियाबंद नगर के गौरव पथ पर बन रहे व्यावसायिक परिसर के निर्माण पर भ्रम फैला रहे विरोध में खड़े लोगों की राजनीति के उस चेहरे को बेनकाब कर दिया है, जिसे ‘दोगलापन‘ कहना भी शायद छोटा शब्द होगा,यहाँ एक तरफ तो गांधी मैदान बचाने के नाम पर सोशल मीडिया पर जमकर छाती पीटी जा रही है, और जनता को गुमराह किया जा रहा है कि दुकानाे का निर्माण गलत तरीके से किया जा रहा हैं, लेकिन दूसरी तरफ वही कथित आंदोलनकारी नगर पालिका के काउंटर पर सबसे ऊँची बोली लगाकर दुकानें अपने और अपने परिजनों के नाम सुरक्षित कर रहे हैं।

गरियाबंद गौरव पथ दुकान

गरियाबंद गौरव पथ दुकान विरोध का ड्रामा और नीलामी का चस्का भी

​इस पूरे मामले में सबसे हास्यास्पद और शर्मनाक पहलू यह है कि जो लोग इस निर्माण को पाप बता रहे थे, उनके खुद के पापा इसमें भागीदार बने हुए है । जिन दुकानों की 16 नीलामी के लिए रात 3 बजे तक महिला और पुरुष बोली लगाने लाइन में लगे रहे। और उसी इस प्रोजेक्ट के खिलाफ सबसे मुखर होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उनकी पोल तब खुल गई जब वे खुद 16 फरवरी की नीलामी में सबसे सामने बैठकर नीलामी में शामिल हुए और एक दुकान के लिए सेकंड हाईएस्ट बोली भी लगा डाली

​हद तो तब हो गई जब उनके परिवार के सदस्य ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कोटे से प्रथम तल की दुकान महज 5 लाख और कुछ हजार रुपये की बोली लगाकर खरीद लिया। अब जनता यह पूछ रही है कि साहब, अगर दुकान बनाना गलत है, तो उसे खरीदना सही कैसे हो गया? क्या यह विरोध सिर्फ इसलिए था ताकि आम जनता डर कर पीछे हट जाए और आंदोलनकारियों को सस्ते में दुकानें मिल जाएं? चर्चा तो पुराने जख्मों को कुरेदने की भी है । बताया जा रहा है कि नगर पालिका चुनाव के दौरान ये माननीय अध्यक्ष पद के दावेदार बने थे लेकिन महज कुछ घंटों के लिए पार्टी ने अपनी भूल सुधरते हुए इनका पत्ता काट दिया था । जिसकी टीस अभी भी बाकी है और इसलिए शहर के विकास में रोड़ा बनकर विरोध का मोर्चा खोले हुए है।

देखे किसने कितनी बोली में दुकान खरीदी

पूर्व दिग्गज अपने कार्यकाल में डुबाए ढाई करोड़ अब विकास में बने रोड़ा

इस विरोध की आग में घी डालने वाले पूर्व जनप्रतिनिधी का रिकॉर्ड भी कुछ खास साफ नहीं है। गांधी मैदान के पास जिन दुकानों का निर्माण होना है उसकी प्लानिंग अपने कार्यकाल के दौरान इन महोदय ने भी की थी मगर सफलता हाथ नहीं लगी तो अब खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर लिए सोशल मीडिया पर घड़ियाली आंसू बहा रहे है इस पूर्व अध्यक्ष ने अपने कार्यकाल में अपनी जिद और अपने चहेते को ठेका देने के लिए जनता के लगभग 2.5 करोड़ रुपये गार्डन और ऐसी लाइटों में स्वाहा कर दिए जो 2 साल भी नहीं टिक सकीं, वे इतने में ही नहीं रुके है उन्होंने तो नेशनल हाईवे को लिखित में सरेंडर कर दिया था कि वे जनता का पैसा अपनी मर्जी से बर्बाद कर रहे हैं और भविष्य में रोड बनी तो इसे उखाड़ने का खर्च भी नगर पालिका ही उठाएगी ।

आज वही लोग विकास पर सवाल उठा रहे हैं, जो खुद विकास के नाम पर बर्बादी के जनक रहे हैं। यह महाशय भी पिछले चुनाव में अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल थे मगर अध्यक्ष का सीधा चुनाव होने के चलते कुर्सी मिली नहीं जिसकी खीज अभी उतार रहे है । हालांकि 5 साल पद में रहने के बाद भी अध्यक्ष पद का ऐसा मोह चढ़ा है कि आज भी वाहन पूर्व अध्यक्ष लिखा रखा है जिसमें पूर्व को ढूंढने के लिए दूरबीन का सहारा लेना पड़ता है

विपक्षी पार्षद के खुद के काम अधूरे, लेकिन दूसरों के विकास पर पहरे

गौरव पथ के विरोधियों की टोली में एक ऐसे विपक्षी पार्षद भी शामिल हैं, जिनका खुद का विकास कार्यों से बहुत गहरा और बड़ा ही अजीब नाता रहा है। इनके बारे में शहर में चर्चा है कि इन महाशय ने गरियाबंद नगर के विभिन्न वार्डों में जिनमें इनका खुद का भी वार्ड शामिल विकास कार्यों के ठेके तो बड़े चाव से लिए, लेकिन मजाल है कि कोई काम पूरा किया हो। इनके द्वारा लिए गए निर्माण कार्य आज भी अपनी पूर्णता की राह देख रहे हैं और धूल फांक रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये सारे कार्य अपने नहीं दूसरों के नाम पर लेकर उनकी नाव में सवार होकर उसमें भी छेद कर चुके है ।

31 दुकानें बिकीं,17 पर टिकीं क्रांतिकारियों की नजरें

​नगर पालिका की इस पारदर्शी प्रक्रिया में अब तक 31 दुकानों की नीलामी पूरी हो चुकी है, जिससे पालिका को 3 करोड़ 47 लाख 97 हजार रुपये प्राप्त होगा। बाकी बची 17 दुकानों की नीलामी 20 फरवरी को होनी है। शहर में चर्चा है कि जो लोग अब तक सोशल मीडिया पर मैदान बचाओ का नारा लिख रहे थे, वे अब 20 तारीख के लिए अपने बैंक खातों का बैलेंस चेक कर रहे हैं। यह गरियाबंद के इतिहास का पहला ऐसा अनोखा आंदोलन है जहाँ आंदोलनकारी ही सरकार को पैसा देकर उसी संपत्ति का मालिक बन रहा है जिसका वह विरोध कर रहा है।

रसूखदारों की भूख और नगर पालिका के सख्त नियम

​नीलामी में शहर के कुछ ऐसे रसूखदार व्यापारियों और छुटभैया जनप्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया जिनके पास पहले से दुकानें मौजूद हैं। उन्होंने 2 से 3 दुकानें अपने नाम कर ली हैं, जिससे उनके किराए पर देने के मंसूबों पर सवाल उठ रहे हैं। चूंकि ​इन दुकानों का मासिक किराया मात्र 15 सौ रुपये तय किया गया है। इसलिए इतने कम किराए पर लेकर इसे अधिक किराए पर देने के उद्देश्य से इन दुकानों की बोली लगाई है

हालांकि, नगर पालिका ने अपनी नियमावली में स्पष्ट कर दिया है ​आवंटित व्यक्ति ही दुकान चलाएगा, किसी और को किराए पर देना वर्जित है । इस तरह की जानकारी मिलने पर ऐसे लोगों का आबंटन रद्द कर दिया जायेगा ।

विकास की रफ़्तार और नीलामी का उत्साह

​इन तमाम सियासी खींचतान के बीच आम जनता का उत्साह देखने लायक है। गौरव पथ पर 12×15 स्क्वायर फीट की 48 दुकानों (24 नीचे, 24 ऊपर) के लिए लोग रात 3 बजे तक लाइन में लगे रहे। 16 और 17 फरवरी को हुई नीलामी में महिलाओं और पुरुषों ने जिस तरह बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, उसने विरोधियों के मुंह पर ताला जड़ दिया है।

नगर पालिका अध्यक्ष रिखी राम यादव ने स्पष्ट किया है

कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और कानूनी है। जमीन आवंटन की प्रक्रिया जारी है और इसके लिए रेरा (RERA) अप्रूवल की आवश्यकता नहीं है। गांधी मैदान का स्वरूप नहीं बिगड़ रहा, बल्कि पार्किंग व्यवस्था के लिए दीवार को महज 2 फीट पीछे किया गया है।

यह भी देखे …गरियाबंद नालंदा परिसर निर्माण जिले में शिक्षा क्रांति की शुरुआत… जाने अध्यक्ष रिखी राम यादव ने क्यों कहा अभी बहुत कुछ बाकी है ?

कृपया शेयर करें

लगातार सही खबर सबसे पहले जानने के लिए हमारे वाट्सअप ग्रुप से जुड़े

Join Now

Join Telegram

Join Now

error: Content is protected !!