नक्सली सरेंडर पत्र बस्तर के जंगलों से सरेंडर की बड़ी खबर BBM डिवीजन के 15 सक्रिय नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा को भावुक पत्र लिखकर मुख्यधारा में लौटने की इच्छा जताई है। जानें क्यों बंदूक छोड़ संविधान पर विश्वास जता रहे हैं ये माओवादी और उनकी क्या हैं 3 प्रमुख शर्तें। 2-3 मार्च को महासमुंद में संभावित आत्मसमर्पण की पूरी इनसाइड स्टोरी पैरी टाईम्स पर ।
गरियाबंद बस्तर और ओडिशा के जंगलों में कभी जनयुद्ध का बिगुल फूंकने वाले अब लोकतंत्र की मुख्यधारा में गोता लगाने को बेताब हैं। खबर है कि BBM (बलांगीर-बरगढ़-महासमुंद) डिवीजन के माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा को एक ऐसा पत्र लिखा है, जो न केवल सरेंडर की इच्छा जताता है, बल्कि बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों के आगे लाल सलाम के झुकने की कहानी भी कहता है।

नक्सली सरेंडर पत्र बंदूक के साए से निकलकर संविधान की छांव चाह
कभी जंगलों में समानांतर सरकार चलाने का ख्वाब देखने वाले इन नक्सलियों को अब समझ आ गया है कि बदली हुई आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में सशस्त्र संघर्ष का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है। पत्र में सचिव विकास ने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में स्वीकार किया है कि अब भारत के संविधान के दायरे में रहकर जनता का हित करना ही बेहतर विकल्प है। इसे आप वैचारिक हृदय परिवर्तन कहें या सुरक्षा बलों के दबाव का असर, लेकिन ‘लाल गलियारे’ में अब लोकतंत्र की गूंज सुनाई दे रही है।
रेडियो पर आश्वासन का इंतजार और 15 का लकी नंबर
इस पूरी सरेंडर की कहानी में सबसे दिलचस्प मोड़ रेडियो का है। माओवादी चाहते हैं कि गृह मंत्री स्वयं रेडियो के माध्यम से उन्हें सुरक्षा की गारंटी दें। उनका कहना है कि जैसे ही वे मंत्री जी का आश्वासन सुनेंगे, एक सप्ताह के भीतर बाहर आ जाएंगे।
इस टोली में कुल 15 लोग शामिल हैं, जिनमें
- DVC (डिविजनल कमेटी सदस्य): 3
- AC (एरिया कमेटी सदस्य): 5
- PM (पार्टी सदस्य): 7
हैरानी की बात यह है कि सरेंडर करने की चाह रखने वाले इन 15 में से 14 बस्तर (छत्तीसगढ़) के ही बेटे हैं, जबकि केवल एक ‘विकास’ (सचिव) तेलंगाना का है। इसीलिए इन्होंने तय किया कि जब घर वापसी करनी ही है, तो अपनी माटी यानी छत्तीसगढ़ में ही क्यों न की जाए?
नक्सलियों के सुझाव और सरकार से मांगें
पत्र में नक्सलियों ने केवल सरेंडर की बात नहीं की, बल्कि सरकार को कुछ टिप्स भी दिए हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार माओवादी पार्टी को एक राजनीतिक दल की मान्यता दे दे, केस रद्द कर दे और जेल में बंद साथियों को रिहा कर दे, तो शायद मुट्ठी भर मूर्खों को छोड़कर पूरी की पूरी पार्टी ही हथियार डाल दे।
उन्होंने गृह मंत्री से यह भी गुहार लगाई है कि जब वे बाहर आ रहे हों, तो पुलिस की कॉम्बिंग रोक दी जाए, ताकि रास्ते में उनके साथी तितर-बितर न हो जाएं।
2-3 मार्च की डेडलाइन
इन नक्सलियों ने खुद को 31 मार्च के सरकारी टार्गेट से 28 दिन पहले ही समर्पित करने का वादा किया है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो 2 या 3 मार्च तक महासमुंद जिले में एक बड़ा आत्मसमर्पण देखने को मिल सकता है। यह पत्र स्पष्ट करता है कि अब जंगलों में छिपे लड़ाकों को भी समझ आ गया है कि विकास की राह बंदूक से नहीं, बल्कि बातचीत और संविधान से होकर गुजरती है।
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