हिमांशु साँगाणी
देवभोग, गरियाबंद। देवभोग में अवैध क्लीनिकों की मनमानी जारी है। स्वास्थ्य विभाग की नाकामी और प्रशासन की लचर व्यवस्था के कारण एक बार फिर झोलाछाप डॉक्टरों की लापरवाही से एक जच्चा-बच्चा की मौत हो गई। यह पहला मामला नहीं है, जब इन कथित डॉक्टरों की करतूत से किसी मासूम की जान गई हो, लेकिन कार्यवाही के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। तो हर बार कार्यवाही के कुछ दिनों बाद अवैध क्लीनिक का संचालन दुबारा से शुरू कर दिया जाता है

अवैध क्लिनिक में इलाज के नाम पर मौत की सौदेबाजी!
डूमाघाट निवासी योगेंदी को शुक्रवार प्रसव पीड़ा होने पर उसके परिजनों ने देवभोग स्थित टिकरापारा के एक प्राइवेट नर्सिंग होम में भर्ती कराया। यह नर्सिंग होम पहले टिकरापारा में था, लेकिन अब इसे सेन्दमुड़ा रोड में शिफ्ट कर दिया गया है। इलाज के नाम पर घंटों इंतजार करवाया गया और जब मामला बिगड़ने लगा तो मरीज को दूसरे क्लिनिक भेज दिया गया। वहां न केवल नवजात की जान गई बल्कि प्रसूता की भी मौत हो गई।
प्रशासन की अनदेखी, झोलाछाप डॉक्टरों के हौसले बुलंद!
देवभोग में अवैध क्लीनिकों की यह पहली करतूत नहीं है। पहले भी इन डॉक्टर भाइयों पर गंभीर आरोप लगे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल दिखावा होता है। हर बार इनकी दुकानें चलती रहती हैं और नतीजा मासूम जिंदगियों को भुगतना पड़ता है। प्रशासन की निष्क्रियता इन मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं तो और क्या है?
आदिवासी समाज ने किया प्रदर्शन, 50 लाख मुआवजे की मांग
इस दर्दनाक घटना के बाद अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद ने गरियाबंद कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है। आदिवासी नेता लोकेश्वरी नेताम और संजय नेताम के नेतृत्व में हुए इस प्रदर्शन में दोषियों पर गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज करने, क्लिनिक सील करने और पीड़ित परिवार को 50 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की गई है।
कोई दोषी नहीं ?
मामले में एसडीओपी विकास पाटले अपनी टीम के साथ पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। पुलिस का कहना है कि पीड़ित परिवार किसी पर आरोप नहीं लगा रहा और न ही किसी के खिलाफ कार्रवाई चाहता है। लेकिन पीड़ित परिवार अपने समाज में जाकर इस मामले लापरवाही करने वालों की खिलाफ कार्यवाही की गुहार भी लगा रहा है अब यह सवाल उठता है कि प्रशासन पीड़िता को न्याय दिलाना चाहता है या नहीं ।
जांच टीम बनी, पहले भी कार्यवाही हुई लेकिन हर बार कुछ दिनों बाद क्लिनिक शुरू हो जाता है ?
सीएमएचओ गर्गी यदु ने मामले की जांच के लिए 6 सदस्यीय टीम गठित की है। इसमें डॉ. अंकुश वर्मा, डॉ. हरीश चौहान, डॉ. सुनील रेड्डी, डॉ. प्रकाश साहू, योगेंद्र रघुवंशी और सोमेश्वर ठाकुर शामिल हैं। इस डाक्टरों के द्वारा जांच कर रिपोर्ट सौंपी जाएगी । ऐसा नहीं है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा इन क्लिनिक संचालकों पर पहले कार्यवाही नहीं की गई है । इन पर कार्यवाही तो होती है लेकिन ठोस कार्यवाही के अभाव में कार्यवाही के कुछ दिनों के बाद क्लीनिक का संचालन दुबारा शुरू कर दिया जाता है ।
लापरवाही से मौतें जारी, कार्रवाई के नाम पर जीरो टॉलरेंस!”
स्थानीय प्रशासन की लगातार अनदेखी पर देवभोग के साथ ही जिलेभर में सवाल उठ रहे हैं। अगर इस बार भी दोषियों पर सख्त कार्यवाही नहीं हुई, तो देवभोग के इन अवैध क्लीनिकों में मासूम मरीजों के इलाज के नाम पर उनकी जांच से खिलवाड़ का सिलसिला जारी रहेगा और न जाने कितने मासूमों की जान जाएगी।
अब सवाल यह है कि –
✅ क्या प्रशासन दोषियों पर कार्रवाई करेगा या फिर एक और जांच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली जाएगी?
✅ क्या आदिवासी समाज को न्याय मिलेगा, या हर बार की तरह इस बार भी यह मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा?
✅ आखिर कब तक देवभोग के मासूम झोलाछाप डॉक्टरों के चंगुल में फंसकर अपनी जान गंवाते रहेंगे?