संपादक पैरी टाईम्स 24×7 डेस्क गरियाबंद
लाइफ थ्रेटनिंग जांच नकली सिरप स्कैंडल में गरियाबंद खाद्य विभाग की 30 दिन की नींद क्यों? राजिम के कुलेश्वर मेडिकल से जुड़े नवकार मेडिकल पर देर से हुई रेड ने जाँच में विलंब, लाइजनिंग और व्यापारिक साज़िशों पर खड़े किए गंभीर सवाल ।
गरियाबंद/नवापारा विवेचना एक्सप्रेस नामक सरकारी ट्रेन (जो अक्सर तीन महीने लेट चलती है) ने आखिरकार गरियाबंद के नकली कफ सिरप स्कैंडल में 30 दिन की लंबी झपकी के बाद नवापारा के नवकार मेडिकल स्टोर पर हॉर्न बजाया है। राजिम के कुलेश्वर मेडिकल में ज़ब्त हुए ख़तरनाक नकली सिरप की जाँच में जब नवकार का नाम आया, तो लगा कि अब तो तूफ़ान आएगा, पर आया क्या? केवल एक धीमा टहलना ।

लाइफ थ्रेटनिंग जांच कछुए की चाल से रेंगते अधिकारी
खाद्य एवं औषधीय प्रशासन विभाग की कार्यशैली पर अब जनता चुटकी ले रही है। जुलाई में नकली सिरप मिला। विभाग ने कहा, यह तो लाइफ थ्रेटनिंग मामला है, तुरंत एक्शन लेंगे!
मगर, तुरंत एक्शन का मतलब निकला
जुलाई-अक्टूबर तीन महीने तक कागज़ों पर गहन ध्यान योग।
नवंबर में कुलेश्वर संचालक को गिरफ़्तार किया (शायद ज़्यादा नींद आने पर)।
1 दिसंबर नवकार मेडिकल पर छापा ठीक 30 दिन बाद (क्योंकि शायद कैलेंडर पर 1 महीना पूरा होने का इंतज़ार था)।
सवाल यह है जिस केस को विभाग ने इतना सीरियस बताया, उसमें कार्यवाही इतनी धीमी क्यों? क्या विभाग के पास सिर्फ़ एक ही घड़ी है जो सिर्फ़ लेट टाइम दिखाती है?

लाइजनिंग का WhatsApp चैट ड्रामा दोस्ती की मिसाल
स्थानीय गलियारों में चर्चा गर्म है कि यह मामला सिर्फ़ दवा का नहीं, बल्कि दोस्ती और व्यवसाय का भी है। सूत्रों के मुताबिक, मामले से जुड़े कुछ व्हाट्सऐप चैट्स और ऑडियो तेज़ी से वायरल हो रहे हैं। इन्हें देखकर लगता है कि राजधानी में बैठे अधिकारियों की निगरानी में यह सीरियस मामला नहीं, बल्कि दो जिलों के बीच की शायद डील वार्तालाप का एक बेहतरीन एपिसोड चल रहा था कहा जा रहा है कि शायद विभाग किसी मनमाफिक लाइजनिंग के इंतज़ार में था जब तक बात नहीं बनी, तब तक नवकार मेडिकल को सरकारी छूट मिली रही। ऐसा लगता है, ज़िला मुख्यालय में बैठे किसी चहेते मेडिकल संचालक को व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में टॉप पर रखने के लिए यह खेला किया गया है ।
निरीक्षक बोले विवेचना जारी है… बस सबूत ही जुटा रहे हैं ।
सभी आरोपों को ख़ारिज करते हुए, खाद्य औषधि निरीक्षक धरमवीर सिंह ध्रुव ने मीडिया में शांत बयान दिया है, विवेचना जारी है। लिंक स्थापित होने के बाद साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। जनता कह रही है सर, लिंक तो जुलाई में ही स्थापित हो गया था क्या आप डिजिटल साक्ष्य की फ़ाइल डाउनलोड होने का इंतज़ार कर रहे थे, जो 2G स्पीड पर चल रही थी? यह पूरा प्रकरण इस बात का सबूत है कि हमारी सरकारी मशीनरी आरोप और सबूत के बीच इतना वक़्त ले लेती है कि अपराधी तब तक अपनी दुकान का नाम और पता दोनों बदल लेते हैं!
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