हिमांशु साँगाणी / गरियाबंद
बीजापुर। सच की तलाश में निकले पत्रकार मुकेश चंद्रकार की जिंदगी एक दर्दनाक मोड़ पर खत्म हो गई। बीजापुर से गंगालूर , नेलशनार तक 120 करोड़ की लागत से बन रही थी 52 किलोमीटर की सड़क । इसी खबर के प्रकाशन के बाद लोक निर्माण विभाग ने जांच दल गठित कर दिया था । जिन खबरों के जरिए उन्होंने जनता के लिए आवाज उठाई, वही शायद उनकी आखिरी रिपोर्ट साबित हुई। बीजापुर में उनकी आखिरी मोबाइल लोकेशन ठेकेदार सुरेश चंद्राकर के परिसर के पास स्थित एक सेप्टिक टैंक से उनका शव बरामद हुआ है। यह टैंक उसी सड़क ठेकेदार के घर के पीछे है, जिसके खिलाफ उन्होंने कुछ समय पहले खबर प्रकाशित की थी। पुलिस शव को बाहर निकालने के लिए सेप्टिक टैंक खाली कर रही है। लेकिन यह सवाल अब हर किसी के मन में उठ रहा है—क्या मुकेश की मौत एक हादसा थी, या यह पत्रकारिता के खिलाफ एक खतरनाक साजिश?

पत्रकारों की सुरक्षा पर फिर उठा सवाल
छत्तीसगढ़ में पत्रकारों की सुरक्षा हमेशा से एक गंभीर मुद्दा रहा है। कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन पत्रकारों के लिए सुरक्षा कानून लागू नहीं हो पाया। हर बार किसी पत्रकार पर हमला होता है, तो सरकारें सिर्फ सांत्वना देती हैं, लेकिन व्यवहारिक सुरक्षा देने में नाकाम रहती हैं। अगर पत्रकार सुरक्षा कानून पहले लागू हो चुका होता, तो शायद आज मुकेश चंद्रकार जैसे पत्रकार को अपनी जान न गंवानी पड़ती। लेकिन जब तक यह कानून सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहेगा, तब तक पत्रकारों पर हमले यूं ही होते रहेंगे।
भ्रष्टाचार उजागर करने की चुकाई कीमत ?
मुकेश चंद्रकार ने कुछ समय पहले ही एक सड़क ठेकेदार के भ्रष्टाचार को उजागर किया था। अब,उसी ठेकेदार के घर के पीछे से उनका शव मिलना सिर्फ इत्तेफाक नहीं हो सकता।
परिवार के मुताबिक, मुकेश ने कभी डरना नहीं सीखा। अगर उनकी हत्या हुई है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि पत्रकारिता पर हमला है।
परिवार और पत्रकार संगठनों में आक्रोश
मुकेश चंद्रकार की मौत के बाद पत्रकार संगठनों और उनके परिजनों में भारी आक्रोश है। स्थानीय पत्रकार संगठनों ने इस घटना को पत्रकारिता पर हमला करार देते हुए सरकार और प्रशासन से निष्पक्ष जांच और दोषियों की जल्द गिरफ्तारी की मांग की है। परिजनों का भी साफ कहना है कि मुकेश को न्याय मिलने तक वे चुप नहीं बैठेंगे।
आखिर कब लागू होगा पत्रकार सुरक्षा कानून,इस बार कुछ बदलेगा?
यह घटना एक बार फिर बताती है कि भारत में पत्रकारिता करना कितना खतरनाक हो गया है। हर सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून की बातें तो करती है, लेकिन आज तक इसे लागू नहीं किया गया। अब सवाल यह है कि क्या मुकेश चंद्रकार को न्याय मिलेगा? या यह मामला भी अनसुलझे केसों की फाइलों में गुम हो जाएगा?
जुमला बन कर रह गया पत्रकार सुरक्षा कानून ?
इस घटना के बाद पत्रकारों ने ने सरकार के रवैया पर सवाल उठाते हुए कहा कि पत्रकार सुरक्षा कानून तो केवल जुमला बनकर रह गया है उन्होंने मांग की है कि पत्रकार सुरक्षा कानून को जल्द से जल्द लागू किया जाए ताकि भविष्य में किसी और मुकेश को इस तरह अपनी जान न गंवानी पड़े।