गरियाबंद कांग्रेस में सबसे बड़ा खेला हुआ सबकी निगाहें भवानी शंकर शुक्ला और युगल पांडे पर थीं, फिर भी बाजी मार ली इस व्यक्ति ने जिलाध्यक्ष चुनाव की इस चौंकाने वाली पटकथा के पीछे कौन है? जानिए कांग्रेस के तीसरे दांव।की इनसाइड स्टोरी, जिसे जानना आपके लिए बेहद ज़रूरी है।
गरियाबंद, जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद के चुनाव ने जिले की राजनीति में एक रोमांचक भूचाल ला दिया है। जिस कुर्सी के लिए जिले के दो सबसे कद्दावर और दमदार नेता एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे, वह अचानक एक ऐसे चेहरे की झोली में आ गिरी, जिसे इस रेस में तीसरे नंबर का दावेदार माना जा रहा था। जी हां, हम बात कर रहे हैं सुखचंद बेसरा की, जिन्होंने तमाम सियासी अटकलों को ध्वस्त करते हुए कांग्रेस के नए जिलाध्यक्ष का ताज पहन लिया है।

कांग्रेस में तीसरा दांव दिग्गजों को धूल चटाकर सुखचंद बेसरा बने जिलाध्यक्ष, क्या है इस अप्रत्याशित जीत के पीछे का राज?
बेसरा को बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है, लेकिन इस अप्रत्याशित घोषणा के बाद राजनीतिक गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है: आखिर आलाकमान ने यह चौंकाने वाला फैसला क्यों लिया?
हाई-वोल्टेज मुकाबला फर्स्ट टू हुए चित
यह चुनाव किसी थ्रिलर से कम नहीं था। जिलाध्यक्ष पद की दौड़ में शुक्ला परिवार के चिराग भवानी शंकर शुक्ला और गरियाबंद के कद्दावर नेता युगल पांडे को सबसे आगे माना जा रहा था। दोनों ही नेता अपने मजबूत जनाधार और दिल्ली तक पैठ के कारण इस कुर्सी के प्रबल दावेदार थे। मुकाबला इन दो धुरंधरों के बीच आर-पार की टक्कर वाला था।
तीसरे दांव ने लाया भूचाल
मगर, कांग्रेस आलाकमान ने अचानक तीसरा दांव खेलकर सबको चौंका दिया। दोनों बड़े प्रतिद्वंदियों को पछाड़कर, सुखचंद बेसरा ने बाजी मार ली। बेसरा की जीत ने साफ कर दिया कि पार्टी की रणनीति में संतुलन और ज़मीनी कार्यकर्ता पर दांव लगाना भी शामिल था।
दरकिनार हुई शुक्ला विरासत एक बड़ा राजनीतिक जोखिम
इस फैसले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि कांग्रेस पार्टी ने गरियाबंद में शुक्ला परिवार की दशकों पुरानी राजनीतिक विरासत को दरकिनार करने का एक बड़ा जोखिम लिया है। भवानी शंकर शुक्ला को दरकिनार कर बेसरा को जिलाध्यक्ष बनाने का यह निर्णय बताता है कि पार्टी अब पुरानी पहचान के बजाए नए समीकरणों को साधने की कोशिश कर रही है। शुक्ला परिवार न केवल राजिम, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी दशकों से सक्रिय रहा है और कांग्रेस पार्टी के लिए राज्य में एक बड़ा चेहरा माना जाता है। ऐसे प्रतिष्ठित परिवार के चिराग को जिलाध्यक्ष पद की दौड़ में तीसरे स्थान पर रहे नेता से पछाड़वाना, हाईकमान के असामान्य और साहसिक फैसलों में गिना जाएगा।
सियासी शतरंज गुटबाजी पर लगाम लगाने का प्रयास?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस ने यह कदम पार्टी के भीतर गुटबाजी को साधने और युवा व निष्ठावान कार्यकर्ताओं को संदेश देने के लिए उठाया है।
- संतुलन दो बड़े दिग्गजों (शुक्ला और पांडे) में से किसी एक को चुनने पर दूसरे गुट की नाराजगी का खतरा था।
- मास्टरस्ट्रोक सुखचंद बेसरा का चयन कर, पार्टी ने एक ऐसा संतुलित और स्वीकार्य चेहरा पेश किया है, जो गुटबाजी से दूर माना जाता है।
इस फैसले ने साबित कर दिया है कि राजनीति में सिर्फ दबदबा ही नहीं, बल्कि आलाकमान की गोपनीय रणनीति भी सर्वोपरि होती है।
आगे की राह बेसरा के सामने चुनौतियाँ
अप्रत्याशित विजेता बनकर उभरे सुखचंद बेसरा के सामने अब असली अग्निपरीक्षा शुरू हो गई है। उन्हें यह साबित करना होगा कि वह इस पद के साथ न्याय करने में सक्षम हैं और आलाकमान का उन पर भरोसा सही था।
- एकजुटता सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह दोनों बड़े नेताओं (शुक्ला और पांडे) के समर्थकों को साथ लेकर चलें और पार्टी के भीतर सद्भाव स्थापित करें।
- संगठन आगामी चुनावों के लिए पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करना और गरियाबंद जिले में कांग्रेस को नई ऊँचाइयों पर ले जाना उनका मुख्य लक्ष्य होगा।
अब देखना होगा कि नेपथ्य से आकर कुर्सी हथियाने वाले सुखचंद बेसरा, अपने कार्यकाल में कांग्रेस पार्टी को किस दिशा में ले जाते हैं और क्या वह दोनों धुरंधर प्रतिद्वंदियों को पीछे छोड़ने के बाद उनके सहयोग को भी हासिल कर पाते हैं।
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