रक्तदान का जुनून: ‘रक्तवीरों का गांव’ बना मालगांव, जन्मदिन पर भीम निषाद ने फिर रचा इतिहास ।

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By Himanshu Sangani

हिमांशु साँगाणी

गरियाबंद का ऐसा गांव जहां हर घर से निकलते हैं रक्तदाता!

गरियाबंद जिले का मालगांव अब सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि ‘रक्तवीरों का गांव’ बन चुका है। यहां रक्तदान सिर्फ एक सेवा नहीं, बल्कि एक परंपरा बन चुकी है। समाजसेवी और जनपद पंचायत सदस्य भीम निषाद ने इस परंपरा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। पिछले चार वर्षों से वे अपने जन्मदिन पर न सिर्फ खुद रक्तदान कर रहे हैं, बल्कि पूरे गांव को इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं। पिछले साल भी निषाद के वहां पर 108 लोगों ने रक्तदान किया था इस साल उनके आह्वान पर 161 लोगों ने रक्तदान किया, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

रक्तदान के साथ ‘स्वास्थ्य की सुरक्षा’ – स्मार्ट वॉच का अनोखा गिफ्ट

रक्तवीरों का गांव इस बार भीम निषाद ने रक्तदान को और खास बना दिया। उन्होंने रक्तदान करने वाले सभी लोगों को स्मार्ट वॉच गिफ्ट की, ताकि वे अपने स्वास्थ्य पर नजर रख सकें। यह पहल इलाके में चर्चा का विषय बन गई है और अन्य जगहों के लोग भी इससे प्रेरित हो रहे हैं।

दिव्यांग ने किया 18वीं बार रक्तदान, 35 बार रक्तदान करने वाले भी पहुंचे

रक्तवीरों का गांव मालगांव के इस रक्तदान अभियान में कई ऐसे लोग भी जुड़े, जो वर्षों से दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए रक्तदान कर रहे हैं—
✅ कस निवासी दिव्यांग चैंपेश्वर ध्रुव ने 18वीं बार रक्तदान किया और युवाओं को प्रेरित किया।
✅ गरियाबंद के रोमी सिन्हा, जो अब तक 35 बार रक्तदान कर चुके हैं, इस मुहिम का हिस्सा बने।
✅ कई कॉलेज छात्रों ने पहली बार रक्तदान कर इस परंपरा को और मजबूत किया।

मालगांव: जहां रक्तदान अब ‘फैशन’ बन चुका है!

मालगांव में बच्चे, युवा, बुजुर्ग – सभी रक्तदान को लेकर उत्साहित रहते हैं। यहां रक्तदान किसी ‘महादान’ से बढ़कर ‘फैशन’ बन चुका है। हर घर से कोई न कोई रक्तदाता निकलता है, जिससे यह गांव पूरे जिले में मिसाल बन गया है। इसलिए इस गांव को अब रक्तवीरों का गांव भी कहा जाता है

भीम निषाद का संकल्प – अगले साल 200+ रक्तदाता होंगे!

रक्तवीरों का गांव कहे जाने वाले मालगांव के निवासी भीम निषाद का कहना है कि यह सिर्फ एक शुरुआत है। उनका लक्ष्य है कि अगले साल 200 से अधिक लोग रक्तदान करें और मालगांव को छत्तीसगढ़ में ‘रक्तदान मॉडल गांव’ के रूप में स्थापित किया जाए।

रक्तवीरों की इस परंपरा को सलाम!

मालगांव के इस जुनून को देखकर एक बात तो साफ है—यह सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुका है। जहां अन्य जगहों पर रक्तदान के लिए जागरूकता अभियान चलाने पड़ते हैं, वहीं मालगांव खुद ही ‘रक्तदान की पाठशाला’ बन गया है। क्या आपका गांव भी ऐसा बन सकता है?

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