गरियाबंद में गणतंत्र दिवस पर उड़ी प्रोटोकॉल की धज्जियां गरियाबंद गणतंत्र दिवस विवाद प्रभारी मंत्री की नाराजगी और पत्रकार के सम्मान पर बवाल गरियाबंद में गणतंत्र दिवस पर प्रभारी मंत्री दयाल दास बघेल की नाराजगी और वरिष्ठ पत्रकार पुरुषोत्तम पात्र के अपमान को लेकर चर्चाएं तेज जानिए क्या है पूरा मामला पैरी टाईम्स पर ।
गरियाबंद गरियाबंद जिले में गणतंत्र दिवस का पर्व इस बार राष्ट्रीय गौरव से ज्यादा प्रोटोकॉल के विसर्जन के लिए याद किया जाएगा। चर्चा है कि एक तरफ प्रभारी मंत्री के पेट की आग बुझाने में प्रशासन के पसीने छूट गए, तो दूसरी तरफ एक वरिष्ठ पत्रकार को सम्मानित करने के लिए प्रशासन ने शायद टाइम मशीन या प्राइवेट जेट की उम्मीद पाल रखी थी।

गरियाबंद में गणतंत्र दिवस पर उड़ी प्रोटोकॉल की धज्जियां किस्सा-ए-सर्किट हाउस जब मंत्री जी को मिला इंतजार का फल
सूत्रों की मानें तो 25 जनवरी की रात सर्किट हाउस में जो हुआ, वह जिले के लिए किसी अपमान से कम नहीं था। प्रभारी मंत्री दयाल दास बघेल अपने काफिले के साथ पहुंचे, तो उम्मीद थी कि लाल कालीन न सही, कम से कम गर्म रोटी तो नसीब होगी। लेकिन अफवाहों का बाजार गर्म है कि साहबों ने सोचा मंत्री जी को आने में देर होगी, तो खाना बनाने की मेहनत क्यों करें? पर मंत्री जी समय के पाबंद निकले। आनन-फानन में जो भोजन परोसा गया, उसकी क्वालिटी देखकर मंत्री जी का पारा गरियाबंद की ठंड में भी उबल गया,चर्चा है कि इस लापरवाह दावत के बाद सूत्रों का कहना है कि एक अधिकारी का सस्पेंशन ऑर्डर पाइपलाइन में है और उस अधिकारी का विकेट गिरना तय है। अब देखना यह है कि गाज किस टीम लीडर के प्यादे पर गिरती है।

सम्मान या मजाक ? पत्रकार को 50 मिनट में 120 किमी बुलाने की चुनौती
प्रोटोकॉल का दूसरा तमाशा तब देखने को मिला जब जिले के वरिष्ठ पत्रकार पुरुषोत्तम पात्र के सम्मान की बारी आई। सूत्रों के अनुसार, नक्सल उन्मूलन जैसे गंभीर विषय पर सम्मानित होने वाले पत्रकार को सूचना 9.40 मिनट पर दी गई, और 10.30 को पहुंचने कहा गया । जब कार्यक्रम शुरू होने में महज कुछ मिनट बचे थे।
प्रशासन शायद यह मान बैठा था कि देवभोग में रहने वाले पत्रकार के पास प्राइवेट जेट खड़ा है, जिससे वे उड़कर सीधे जिला मुख्यालय लैंड कर जाएंगे। इस लेट-लतीफी को पत्रकार के अपमान के तौर पर देखा जा रहा है।
चाटुकारिता का सुनहरा युग और किनारे किए जाते कलमकार
गलियारों में दबी जुबान से चर्चा है कि जिले में जब से कप्तान बदले हैं, तब से समीकरण भी बदल गए हैं। अब गोद में बैठने वाले और जी हुज़ूरी करने वाले बाहरी पत्रकारों के लिए विज्ञापन और सुविधाओं और सम्मान की बरसात हो रही है, जबकि शासन-प्रशासन की कमियों को आईना दिखाने वाले पत्रकारों को प्रोटोकॉल के नाम पर किनारे किया जा रहा है।
अंधेर नगरी चौपट राजा जैसे हालत
गरियाबंद के हालत इन दिनों अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा जैसे बने हुए है जब जिले का मुखिया और टीम लीडर ही तालमेल बिठाने में नाकाम हो, तो फिर पूरी टीम से सुशासन की उम्मीद करना बेमानी है। गरियाबंद में गणतंत्र दिवस पर सम्मान कम और सिस्टम का अपमान ज्यादा नजर आया।
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