सत्ता की छतरी में रसूख का इलाज जारी अमलीपदर क्षेत्र में एक सप्ताह में दो मौतों से स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर सवाल उठे हैं। अभिलाष नेताम की मौत के बाद अब जांच और कार्रवाई की परीक्षा है पढ़े पूरी ख़बर पैरी टाईम्स पर।
गरियाबंद जिले में अगर आप सत्ता पक्ष से जुड़े हुए झोलाछाप डॉक्टर भी है तो इस जिले में आप नियमों के जाल की आड़ में कार्यवाही से बच सकते है मगर आपके पास सत्ता का रसूख नहीं है तो कितने भी बड़े डाक्टर या क्लिनिक के संचालक क्यों न हो आपका लाइसेंस केवल खबर प्रकाशन के आधार पर ही निरस्त होकर आपका क्लिनिक बंद हो सकता है । यह बात इसलिए बता रहे है कि गांव के भोले-भाले लोग जब बीमारी से परेशान होते हैं तो उन्हें सबसे पहले बड़े अस्पताल या विशेषज्ञ की तलाश नहीं होती, बल्कि गांव-कस्बे में आसानी से उपलब्ध इलाज ही नजर आता है।
इसी भरोसे के बीच अगर कोई व्यक्ति अपनी कथित योग्यता और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर गंभीर बीमारियों का उपचार करने लगे, तो यह सिर्फ चिकित्सा का मामला नहीं रह जाता, बल्कि मरीज की जिंदगी और सरकारी निगरानी व्यवस्था दोनों का सवाल बन जाता है। गरियाबंद के अमलीपदर क्षेत्र में एक सप्ताह के भीतर दो मरीजों की मौत के मामले ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर ऐसे ही कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे गंभीर बात यह है कि दूसरे मरीज 55 वर्षीय अभिलाष नेताम की मौत की जानकारी स्वास्थ्य प्रशासन को अभी नहीं है । यानी जिस क्षेत्र में इसी डाक्टर के द्वारा कुछ दिन पहले ही एक मरीज की मौत के बाद निजी उपचार व्यवस्था सवालों के घेरे में आई थी, उसी क्षेत्र में कथित उपचार के बाद एक और मरीज की जान चली गई, लेकिन निगरानी तंत्र को इसकी जानकारी तक नहीं हुई।अब सवाल यह है कि आखिर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी किस चीज पर है मरीजों की सेहत पर या मौत के बाद बनने वाली फाइलों पर?

सत्ता की छतरी में रसूख का इलाज जारी,इंजेक्शन के बाद बिगड़ी हालत, फिर रेफरल की दौड़
सरनाबहाल कुर्लापारा निवासी 55 वर्षीय अभिलाष नेताम का उपचार अमलीपदर में डॉक्टर मनीष सिन्हा द्वारा किया गया था। ऐसा कहना है उरमाल स्वास्थ्य केंद्र के मेंडिकल इंचार्ज शरद कुम्भकार का उन्होंने बताया कि अभिलाष नेताम को उपचार के दौरान तीन एंटी-मलेरियल इंजेक्शन लगाए गए। इंजेक्शन का डोज पूरा होने के बाद अभिलाष की तबीयत बिगड़ने लगी और उन्हें सांस लेने में परेशानी हुई।
14 सितंबर की रात करीब 8:40 बजे उन्हें उरमाल स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। वहां मेडिकल इंचार्ज शरद कुंभकार ने मरीज की हालत देखकर उसे हायर सेंटर रेफर किया। इसके बाद मरीज को धर्मगढ़ और फिर देवभोग ले जाया गया। उपचार के बाद हालत में कुछ सुधार हुआ तो परिजन उन्हें घर ले आए, लेकिन 15 सितंबर को दोपहर करीब 1 बजे अभिलाष नेताम की मौत हो गई।
परमिशन होम्योपेथी की और इलाज एलोपैथी का

बताया जा रहा है कि उरमाल स्वास्थ्य केंद्र की रेफरल पर्ची में मरीज के पूर्व उपचार और तीन एंटी-मलेरियल इंजेक्शन दिए जाने का उल्लेख है। ऐसे में अब जांच के लिए कई महत्वपूर्ण बिंदु सामने हैं इलाज किसने किया, किस योग्यता के आधार पर किया, कौन सी दवाएं दी गईं, इंजेक्शन किसने लगाए और मरीज की हालत बिगड़ने के बाद रेफरल की प्रक्रिया क्या रही?

पहली मौत की जांच में परिजनों के बयान नहीं देने को आधार बनाते हुए बक्शा
इससे एक हफ्ते पहले सराईपानी निवासी डिगने यादव की मौत का मामला सामने आया था। परिजनों के बयान के अनुसार बुखार के इलाज के दौरान निजी क्लीनिक में आर्टिसुनेट और एंटीबायोटिक इंजेक्शन लगाए गए थे। इसके बाद उनकी हालत बिगड़ी। उन्हें अमलीपदर से देवभोग और फिर धर्मगढ़ ले जाया गया, लेकिन धर्मगढ़ पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई।
मामले में स्वास्थ्य विभाग ने तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई थी जिसने इतने गंभीर मामले के संज्ञान में आने के 4 दिन बाद जांच दल को भेजा विभाग की ओर से कहा गया कि परिजनों ने उपचार स्थल या संबंधित व्यक्ति के बारे में स्पष्ट बयान नहीं दिया। यहीं से सवाल और तीखा हो जाता है।
क्या किसी संदिग्ध चिकित्सा व्यवस्था की जांच केवल मरीज के परिजनों के बयान पर निर्भर है?अगर परिजन बयान नहीं देते तो क्या मेडिकल रिकॉर्ड, रेफरल पर्ची, दवाओं के बिल, स्टॉक रजिस्टर, चिकित्सकीय योग्यता और उपचार की प्रक्रिया की जांच नहीं हो सकती?
डेढ़ साल पुराने वीडियो पर कार्रवाई की रफ्तार, मौत के मामले में ब्रेक क्यों?
स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली को लेकर दूसरा सवाल उसकी पुरानी कार्रवाइयों से भी उठता है। कुछ समय पहले छुरा में दो बड़े क्लिनिकों के लाइसेंस निलंबित करते हुए उन्हें बंद करने की कार्रवाई की गई थी। इसमें केवल स्थानीय स्तर पर समाचार प्रकाशन के बाद विभाग सक्रिय हुआ और कार्रवाई तक पहुंचा। कार्रवाई हुई, यह अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि जब खबर के आधार पर विभाग कार्रवाई कर सकता है, तो मरीज की मौत के मामले में सामने आए दस्तावेजों और आरोपों के आधार पर तत्काल जांच क्यों नहीं हो सकती?
इसी तरह कुछ दिनों पहले देवभोग के एक बड़े अस्पताल में महिला मरीज की मौत के बाद हुई कार्रवाई को लेकर भी क्षेत्र में सवाल उठे थे। अस्पताल का संबंध सत्ता पक्ष से जुड़े बड़े व्यक्ति से होने की चर्चाओं के बीच कार्रवाई के नाम पर महज खानापूर्ति किए जाने के आरोप सामने आए थे। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन ऐसी चर्चाएं भी प्रशासन की निष्पक्षता को लेकर सवाल पैदा करती हैं। और अब अमलीपदर में दो मौतों का मामला सामने है।
तो क्या स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई का भी कोई अलग-अलग पैकेज है खबर छपे तो फुल एक्शन और रसूख हो तो जांच का एक्सटेंशन?
हाईकोर्ट के निर्देश, फिर जमीन पर कार्रवाई कितनी?
झोलाछाप और अनधिकृत चिकित्सा व्यवस्था को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहले भी सख्त रुख अपना चुका है। न्यायालय के आदेशों में अनधिकृत क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट और बिना वैध अनुमति चिकित्सा गतिविधियां संचालित करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत स्पष्ट की गई है। ऐसे मामलों में केवल कागजी खानापूर्ति के बजाय प्रभावी कार्रवाई और निगरानी की अपेक्षा की गई है। इसी व्यवस्था के तहत शिकायत मिलने पर अनधिकृत क्लिनिक की जांच, आवश्यक होने पर सीलबंदी और नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। अलग-अलग पैथी की योग्यता रखने वाले व्यक्ति द्वारा बिना संबंधित एलोपैथिक योग्यता के एलोपैथिक दवा, इंजेक्शन या अन्य उपचार करने का सवाल भी गंभीर है।
ऐसे मामलों में स्वास्थ्य, राजस्व और पुलिस प्रशासन के बीच समन्वय से कार्रवाई की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
अब सवाल यह है कि ये नियम किताबों और सरकारी फाइलों में हैं या अमलीपदर जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी इनका असर दिखाई देगा?
गांव के मरीज किसके भरोसे?
ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्थानीय स्तर पर इलाज करने वालों पर लोगों का भरोसा वर्षों से बना हुआ है। कई परिवार आर्थिक परेशानी, दूरी और सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमाओं के कारण स्थानीय चिकित्सकों के पास पहुंचते हैं। यही भरोसा अगर किसी कथित झोलाछाप व्यवस्था के लिए कमाई का साधन बन रहा है और कोई व्यक्ति अपनी योग्यता से बाहर जाकर उपचार कर रहा है, तो सबसे ज्यादा खतरा उन्हीं गरीब परिवारों को है जो बड़े अस्पताल तक समय पर नहीं पहुंच पाते। अभिलाष नेताम उम्र 55 वर्ष की मौत इसी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल छोड़ गई है।
अब जांच की असली परीक्षा
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या स्वास्थ्य विभाग इस बार भी डिगने यादव मामले की तरह परिजनों के बयान को आधार बनाकर कार्रवाई से पीछे हटेगा या फिर अभिलाष नेताम की मौत के मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और रेफरल पर्ची को आधार बनाकर पूरी जांच करेगा?
क्या उपचार करने वाले व्यक्ति की योग्यता और पंजीयन की जांच होगी?
क्या क्लिनिक की वैधानिक स्थिति देखी जाएगी?
क्या मरीज को दिए गए इंजेक्शन और दवाओं की जानकारी जुटाई जाएगी?
क्या दवा कहां से खरीदी गई, इसका रिकॉर्ड देखा जाएगा?
क्या मेडिकल रिकॉर्ड और रेफरल प्रक्रिया की जांच होगी?
और यदि नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो क्या इस बार वास्तव में कार्रवाई होगी?
राजनीतिक रसूख को लेकर चर्चाएं अपनी जगह हैं, लेकिन किसी को दोषी ठहराने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। उसी तरह किसी शिकायत को सिर्फ बयान के अभाव में खत्म कर देना भी जांच की पूर्णता का प्रमाण नहीं हो सकता।
पैरी टाइम्स 24×7 का सवाल सीधा है एक सप्ताह में दो मौतों के बाद भी अगर निगरानी तंत्र बेखबर है, तो फिर ग्रामीण इलाकों में मरीजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
अब देखना लाजिमी होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस बार भी बयान नहीं मिला कहकर फाइल बंद करने का रास्ता चुनता है या मेडिकल दस्तावेजों, उपचार रिकॉर्ड और नियमों के आधार पर मामले की तह तक पहुंचकर कार्रवाई करके दिखाता है। क्योंकि गरीब और आदिवासी परिवार के लिए डॉक्टर की पहचान नहीं, इलाज की सुरक्षा मायने रखती है। और मरीज की मौत के बाद सबसे जरूरी चीज जांच की औपचारिकता नहीं, जवाबदेही है।