गरियाबंद के बेगरपाल पंचायत में सचिब जी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म सरकारी ऐप में तकनीकी खामी या हकीकत, लंबे समय से चल रही लापरवाही पर कार्यवाही नहीं होने से उठ रहे सवाल ?

Sangani

By Sangani

संपादक पैरी टाईम्स 24×7 डेस्क गरियाबंद

गरियाबंद के बेगरपाल पंचायत में पत्नी सचिव, लेकिन काम करें पति ? बेगरपाल पंचायत का मामला चर्चा में, 2 साल से चल रहा अनोखा खेल हुआ स्थानीय ग्रामीणों के अलावा जिला मुख्यालय में भी चर्चा मगर कार्यवाही के लिए प्रशासन के कांप रहे हाथ पढ़े पूरी ख़बर पैरी टाईम्स पर ।

गरियाबंद जिले के गरियाबंद ब्लॉक अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बेगरपाल इन दिनों स्थानीय पंचायत में तो चर्चा में था ही अब प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। वजह है पंचायत संचालन की व्यवस्था और सरकारी ऐप पर दर्ज जानकारी। क्षेत्र में दबी जुबान यह कहावत चल रही है कि जब सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का, हालांकि यहाँ संदर्भ थोड़ा बदला हुआ नजर आ रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

गरियाबंद के बेगरपाल पंचायत

गरियाबंद के बेगरपाल पंचायत क्या पत्नी की जगह पति संभाल रहे कमान?

सूत्रों से मिल रही जानकारी और क्षेत्र में हो रही चर्चाओं पर गौर करें, तो ग्राम पंचायत बेगरपाल में पदस्थ महिला सचिव की उपस्थिति को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। दबी जुबान में यह बात कही जा रही है कि महिला सचिव की जगह पंचायत का कामकाज अक्सर उनके पतिदेव संभालते नजर आते हैं, जो खुद धवलपुरडीह में पदस्थ बताए जाते हैं। चर्चा यह भी है कि पंचायत से लेकर जनपद की बैठकों तक में मैडम की उपस्थिति कम और उनके प्रतिनिधि के तौर पर पति की सक्रियता ज्यादा देखी जाती है।

सरकारी ऐप ने बढ़ाई सुगबुगाहट

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब सरकारी ऐप मेरी पंचायत पर नजर डाली गई। ऐप में बेगरपाल पंचायत के डेटा में महिला सचिव की जगह उनके पति का नाम प्रदर्शित होना बताया जा रहा है। अब यह महज एक तकनीकी त्रुटि (Technical Glitch) है या फिर धरातल पर चल रही किसी अघोषित व्यवस्था की स्वीकारोक्ति, यह तो जांच का विषय है। लेकिन इसने ग्रामीणों के बीच चर्चा को हवा जरूर दे दी है।

सिस्टम की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

हैरानी की बात यह है कि इतनी चर्चाओं के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी इस मामले से अनजान बने हुए हैं या फिर जानकर भी खामोश हैं? सामान्य तौर पर छोटे कर्मचारियों की छोटी सी गलती पर भी नियम याद दिला दिए जाते हैं, लेकिन यहाँ मामला रसूख का बताया जा रहा है। जनचर्चा है कि राजनीतिक पहुंच के चलते नियमों की अनदेखी हो रही है और बिना कार्य के वेतन आहरण जैसी बातें भी हवा में तैर रही हैं।

जिम्मेदारों का वही पुराना राग देखते हैं

वहीं, जब इस पूरे मामले को लेकर जिला पंचायत सीईओ से फोन पर संपर्क कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो उन्होंने वही चिरपरिचित और रटा-रटाया सरकारी जवाब देखते हैं, मामले को दिखवाते हैं देकर पल्ला झाड़ लिया। साहब का यह देखते हैं कब ठोस कार्यवाही में बदलेगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इस टालमटोल वाले रवैये ने प्रशासन की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगा दिया है।

जिम्मेदारों से उम्मीद

बहरहाल, सच क्या है यह तो निष्पक्ष जांच के बाद ही साफ हो पाएगा। लेकिन फिलहाल बेगरपाल पंचायत की यह व्यवस्था और सरकारी ऐप का यह सच क्षेत्र में कौतूहल का विषय बना हुआ है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस वायरल चर्चा का संज्ञान लेता है या फिर सब चलता है की तर्ज पर फाइल बंद रहती है।

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