गरियाबंद जिला प्रशासन की नींद और माफिया का स्कूप, चांदनी रात में मुरूम के अवैध खनन का शुभ मुहूर्त शुरू ।

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By Sangani

गरियाबंद जिला प्रशासन की नींद नेशनल हाईवे 130C के पास कोदोबतर में रात के अंधेरे में चल रहा है अवैध मुरूम खनन का खेल,अधिकारियों ने साधी चुप्पी, खनिज माफिया बेखौफ। पढ़ें पूरी रिपोर्ट पैरी टाईम्स पर ।

गरियाबंद कहते हैं कि मेहनत का फल मीठा होता है, लेकिन मुख्यालय में इन दिनों अवैध खुदाई का फल ज्यादा मीठा और रेतीला साबित हो रहा है। जब पूरा जिला चैन की नींद सो रहा होता है, तब नेशनल हाईवे 130C के पास मालगांव और कोदोबतर के इलाकों में एक अलग ही विकास कार्य चलता है। यह विकास है खनिज माफिया की जेबों का और सरकारी संपदा की चोरी का।

​गरियाबंद जिला प्रशासन की नींद

गरियाबंद जिला प्रशासन की नींद , जिम्मेदार माफिया की चांदी ।

​गरीब नवाज राइस मिल के पास स्थित एक प्लॉट इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। चर्चा इसलिए नहीं कि यहाँ कोई जनहित का काम हो रहा है, बल्कि इसलिए कि यहाँ रात के अंधेरे का फायदा उठाकर मुरूम चोरी का खेल धड़ल्ले से जारी है। माफिया इतने अनुशासित हैं कि सूरज ढलते ही अपनी मशीनें लेकर मैदान में उतर जाते हैं। प्रशासन की आंखों में धूल झोंकने की कला में माहिर ये लोग शायद यह मान चुके हैं कि नियम-कायदे सिर्फ कागजों के लिए होते हैं।

नंबर नॉट रीचेबल ही असली समाधान?

​हैरानी की बात यह है कि खनिज विभाग और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी खुद से तो कोई कार्रवाई करते नहीं है लेकिन जब कोई नागरिक या जनप्रतिनिधि इन अवैध गतिविधियों की सूचना देने के लिए विभागीय और जिम्मेदार अधिकारियों को फोन लगाते हैं, तो उनका फोन उठाना अंगद के पैर उठाने जैसा भारी लगता है या फिर वे ड्यूटी में होते हुए नॉट रीचेबल हो जाते है गरियाबंद में अधिकारियों की इस बेरुखी ने माफियाओं के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि उन्हें अब कानून का कोई डर नहीं रहा। शायद अधिकारियों ने मौन रहने का संकल्प ले लिया है, जिससे खनिज माफिया अपनी तिजोरियां भरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

प्रशासन की आंख मूंद प्रतियोगिता

​हाईवे के इतने करीब खुदाई हो रही है, गाड़ियां दौड़ रही हैं, लेकिन मजाल है कि प्रशासन की नजर इस पर पड़ जाए,ऐसा लगता है जैसे गरियाबंद में खनिज विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच कौन ज्यादा गहरी नींद सोएगा इसकी प्रतियोगिता चल रही है। नतीजा यह है कि शासन को लाखों का चूना लग रहा है और माफिया खुलेआम जमीन को समतल कर अपनी सल्तनत खड़ी कर रहे हैं।

साहब की कुर्सी बड़ी या माफिया की मर्ज़ी?

जिले के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक अजीब सा मौन व्रत छाया हुआ है। चर्चा तो यहाँ तक है कि गरियाबंद कलेक्टर की कड़क हिदायतें भी स्थानीय अधिकारियों के कानों तक पहुँचते-पहुँचते रास्ते में ही मुरूम की तरह कहीं दब जाती हैं। जिले में इन दिनों अधिकारी राज का ऐसा बोलबाला है कि यहाँ नियम-कायदे नहीं, बल्कि साहबों की सुविधा और चुप्पी चलती है, सूत्रों की मानें तो हालत यह हो गई है कि जिला मुख्यालय से जारी होने वाले आदेशों को निचले स्तर के अधिकारी किसी पुराने अखबार की तरह रद्दी में डाल देते हैं। जब कलेक्टर साहब की बातों का ही वजन कम होने लगे, तो समझ लीजिए कि सिस्टम को किसी गहरे इलाज की जरूरत है। शायद यही वजह है कि अब पीड़ित पक्ष और जागरूक नागरिकों ने मन बना लिया है कि स्थानीय स्तर पर गुहार लगाने से बेहतर है सीधे मुख्यमंत्री निवास का दरवाजा खटखटाया जाए,जब जिले के कप्तान की बात ही टीम न सुने, तो समझ लीजिए कि मैच फिक्स है,अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री कार्यालय की दखल के बाद इन बेलगाम अधिकारियों की नींद टूटती है या फिर माफिया का यह सुनहरा सफर यूं ही जारी रहता है।

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