गरियाबंद जिले में स्कूल जतन योजना के बाद अब 116 स्कूलों में शौचालय निर्माण में बड़ी लापरवाही सामने आई है जहां 62 लाख रुपये खर्च होने के बाद भी एक भी शौचालय पूर्ण नहीं हो सका है पैरी टाइम्स की विशेष रिपोर्ट
गरियाबंद जिले मे अब स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए सरकार की जद्दोजहद चल रही है मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना में आदिवासी विकास विभाग के पूर्व अधिकारियों की लापरवाही और वित्तीय अनियमितताओं की परतें एक के बाद एक खुलती जा रही हैं पूर्व प्रकाशित खबरों में हमने उजागर किया था कि कैसे करोड़ों रुपये जारी होने के बावजूद 3 साल बीत जाने पर भी अधिकांश स्कूल भवन अधूरे पड़े हैं ।

कागजों के दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर
पैरी टाइम्स की टीम ने जमीनी हकीकत दिखाई थी जो विभाग की फाइलों से कोसों दूर थी इस मामले में जारी जांच के बीच अब आदिवासी विकास विभाग का एक और बड़ा कारनामा सामने आया है ताजा जानकारी के अनुसार स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत जिले के 116 स्कूलों में शौचालय निर्माण और मरम्मत के कार्यों का टेंडर जबरदस्ती आदिवासी विकास विभाग को निर्माण एजेंसी बनाकर दे दिया गया था इस निर्माण कार्य की कुल लागत लगभग 1 करोड़ 23 लाख रुपये थी
शिक्षा विभाग के कार्य को अपने विभाग में लिया मगर काम नहीं किया
आदिवासी विकास विभाग के तत्कालीन अधिकारी नवीन भगत ने इस कार्य में भी भारी अंतर का पुराना रिकॉर्ड बरकरार रखा है विभागीय दस्तावेजों और प्राप्त आंकड़ों के आधार पर यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इस कुल योजना राशि में से लगभग 50 प्रतिशत यानी लगभग 62 लाख रुपये से अधिक की राशि पहले ही व्यय की जा चुकी है लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य है एक करोड़ से अधिक की योजना और आधे से ज्यादा बजट खर्च करने के बाद भी एक भी शौचालय का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो पाया है सभी 116 शौचालय आज भी अपूर्ण की श्रेणी में लटके हुए हैं यह मामला सीधे तौर पर पूर्व अधिकारियों के कार्यकाल के दौरान हुई प्रशासनिक और वित्तीय लापरवाही को दर्शाता है फंड डायवर्जन या अन्य कारणों से अटके ये कार्य वनांचल और दुर्गम क्षेत्रों के स्कूलों में बच्चों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रख रहे हैं जिससे उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हो रहे हैं
शौचालय निर्माण एवं मरम्मत कार्य की ब्लॉकवार स्थिति आदिवासी विकास विभाग
जिले के कुल 116 स्कूलों में शौचालय निर्माण और कायाकल्प का जिम्मा आदिवासी विकास विभाग को सौंपा गया था जिसकी कुल लागत 1 करोड़ 23 लाख रुपये तय की गई थी विभाग द्वारा अब तक लगभग 62 लाख रुपये से अधिक की राशि आहरित कर व्यय दिखाई जा चुकी है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सभी 116 कार्य आज भी अपूर्ण की श्रेणी में लटके हुए हैं और एक भी शौचालय का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका है जो सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करता है विभाग अब इन अधूरे कार्यों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है ताकि दोषियों पर कार्यवाही की जा सके ।