मैनपुर शाला प्रवेश उत्सव.. कांग्रेस विरोध करने आई थी, लेकिन सुर्खियां भाजपा की नाराजगी ले गई..काला झंडा बाहर, काला कुर्ता भी बाहर..अपनों से घिरीं सांसद ।

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By Sangani

मैनपुर शाला प्रवेश उत्सव में भाजपा सांसद रूपकुमारी चौधरी के कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस विरोध के बीच भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर सामने आई, काला कुर्ता पहने भाजपा नेता को भी प्रवेश नहीं मिलने से गुटबाजी और मिसमैनेजमेंट की चर्चाएं तेज।

गरियाबंद राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि विपक्ष जितना नुकसान नहीं पहुंचाता, उतना नुकसान कभी-कभी अपने ही लोग कर देते हैं। मैनपुर में आयोजित जिला स्तरीय शाला प्रवेश उत्सव का घटनाक्रम कुछ ऐसा ही संदेश देता नजर आया। कार्यक्रम में भाजपा सांसद रूपकुमारी चौधरी के पहुंचने से पहले कांग्रेस द्वारा काला झंडा दिखाने की तैयारी की खबरों ने माहौल गर्म कर दिया था, लेकिन कार्यक्रम समाप्त होते-होते चर्चा कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के भीतर की नाराजगी और अव्यवस्था की होने लगी।

मैनपुर शाला प्रवेश उत्सव

मैनपुर शाला प्रवेश उत्सव में काला कुर्ता पहने पूर्व युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष को नहीं मिली एंट्री

बताया जा रहा है कि सुरक्षा व्यवस्था और विरोध प्रदर्शन की आशंका के बीच कई लोगों को कार्यक्रम स्थल में प्रवेश से रोका गया। इसी दौरान काला कुर्ता पहने भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व जिला अध्यक्ष को भी कार्यक्रम स्थल में प्रवेश नहीं मिल पाया। चर्चा यह भी रही कि काले झंडे और काले कपड़ों के बीच सुरक्षा अमला शायद रंग पहचानने में इतना व्यस्त हो गया कि अपने और पराए का फर्क ही धुंधला पड़ गया।

चुनाव के दौरान जिन्होंने घर-घर प्रचार किया उन्हीं ने लगाया अनदेखी का आरोप

गरियाबंद जिले में इस घटनाक्रम को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। भाजपा के कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि वर्षों से संगठन में सक्रिय लोग ही कार्यक्रम स्थल के बाहर खड़े रह जाएं, तो फिर कार्यकर्ता आखिर अपनी पहचान किससे कराएं। कार्यक्रम के दौरान कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के उपेक्षित महसूस करने की बातें भी सामने आईं। भाजपा युवा मोर्चा के पूर्व जिला अध्यक्ष योगीराज माखन कश्यप को काला कुर्ता पहनने के चलते प्रशासन ने कार्यक्रम में एंट्री नहीं दी सहित कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं के भी कार्यक्रम में प्रवेश नहीं इसके अलावा महिला कार्यकर्ताओं की अनदेखी भी देखी गई जिसका विरोध कुमारी बाई पटेल , किसान मोर्चा , विशेष आमंत्रित प्रदेश सदस्य, प्रमिला सोनवानी ,भाजपा मंडल उपाध्यक्ष ने भी खुलकर नाराजगी जताते हुए सांसद और जिला अध्यक्ष पर उपेक्षा का आरोप लगाया। उनका कहना था कि वर्षों तक पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को सम्मान और संवाद मिलना चाहिए, लेकिन कार्यक्रम में ऐसा माहौल दिखाई नहीं दिया। यह बयान भी पूरे घटनाक्रम को और चर्चा में ले आया।

कांग्रेस का विरोध जायज पर भाजपा के कार्यकर्ताओं की नाराजगी ने खड़े किए सवाल

हालांकि कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन अपेक्षित था, क्योंकि विपक्ष का काम सवाल उठाना होता है। लेकिन जिस प्रकार भाजपा के अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी सामने आई, उसने पूरे आयोजन की दिशा ही बदल दी। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए कि यदि अपने ही कार्यकर्ता कार्यक्रम में सहज महसूस नहीं कर पा रहे हैं, तो संगठनात्मक समन्वय पर विचार होना स्वाभाविक है।
मैनपुर लंबे समय से भाजपा का मजबूत क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में इसी क्षेत्र में पार्टी के भीतर असंतोष की तस्वीरें सामने आना संगठन के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद की कमी धीरे-धीरे असंतोष का कारण बनती जा रही है।

स्कूल प्रवेशोत्सव कार्यक्रम से ज्यादा कार्यकर्ताओं को प्रवेश नहीं मिलने की चर्चा

कार्यक्रम का उद्देश्य नए विद्यार्थियों का स्वागत कर शिक्षा के प्रति सकारात्मक संदेश देना था, लेकिन आयोजन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा स्कूल प्रवेश उत्सव की नहीं बल्कि प्रवेश व्यवस्था की होती रही। साथ यह भी कहा जाने लगा कि कांग्रेस के काले झंडे से ज्यादा डर काले कुर्ते से लग गया।
हालांकि, इस पूरे मामले में भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं कांग्रेस ने इसे भाजपा की अंदरूनी कलह का प्रमाण बताया है। दूसरी ओर भाजपा के कुछ स्थानीय कार्यकर्ता इसे महज कार्यक्रम प्रबंधन की चूक मान रहे हैं।

सत्ता की कुर्सी दिलाने वाले कार्यकर्ताओं की अनदेखी कितनी जायज

सवाल अब यह नहीं है कि कांग्रेस ने विरोध किया या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा अपने ही कार्यकर्ताओं की नाराजगी को समय रहते दूर कर पाएगी? क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष का विरोध कुछ समय के लिए होता है, लेकिन यदि कार्यकर्ता ही उपेक्षित महसूस करने लगें, तो राजनीतिक चुनौती कहीं अधिक गंभीर हो जाती है। मैनपुर की यह घटना एक बार फिर यह याद दिलाती है कि राजनीति में सबसे कठिन लड़ाई कभी-कभी विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर चल रही खामोश नाराजगी से होती है।

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