स्वस्थ व्यवस्था का बीमार सच गरियाबंद के फिंगेश्वर ब्लॉक के बारुला उप स्वास्थ्य केंद्र की हालत जर्जर है। 2 साल से महिला स्व-सहायता समूह के भवन में इलाज, नया भवन अतिक्रमण से अधूरा पढ़े पूरी ख़बर पैरी टाईम्स पर।
गरियाबंद फिंगेश्वर जिले के फिंगेश्वर ब्लॉक के बारुला गांव में स्वास्थ्य व्यवस्था का ऐसा नजारा सामने आया है, जिसे देखकर शायद सरकारी दफ्तरों की फाइलें भी शर्म से अपना मुंह छिपा लें। गांव का उप स्वास्थ्य केंद्र खुद इतना बीमार है कि यहां मरीजों का इलाज कम और भवन की हालत का इलाज ज्यादा जरूरी नजर आता है। जर्जर भवन, बारिश का पानी, छत से गिरता प्लास्टर और सांप-बिच्छुओं का बसेरा इस उप स्वास्थ्य केंद्र की पहचान बन चुका है,विडंबना देखिए कि जिस भवन में ग्रामीणों को स्वस्थ करने की उम्मीद लेकर पहुंचना चाहिए, वही भवन खुद इलाज का मोहताज है। हालात इतने खराब हैं कि पिछले 2 वर्षों से उप स्वास्थ्य केंद्र महिला स्व-सहायता समूह के भवन में संचालित किया जा रहा है।

स्वस्थ व्यवस्था का बीमार सच बारिश में अस्पताल नहीं, मुसीबत का ठिकाना बन जाता है भवन
बारुला का पुराना उप स्वास्थ्य केंद्र भवन लंबे समय से बदहाली की मार झेल रहा है। बारिश के दिनों में परिसर और भवन के भीतर पानी भरने की स्थिति बन जाती है। छत का प्लास्टर गिर रहा है और जर्जर दीवारें किसी बड़े हादसे की आशंका को जन्म दे रही हैं।ग्रामीणों की मानें तो भवन में सांप-बिच्छुओं का बसेरा बना हुआ है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि यहां मरीज इलाज कराने आएं या पहले यह देखें कि कहीं किसी कोने से कोई बिन बुलाया मेहमान तो नहीं निकल रहा?सरकार ग्रामीणों तक स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने के लिए योजनाएं बनाती है, लेकिन बारुला में हालात ऐसे हैं कि स्वास्थ्य केंद्र को ही सुरक्षित रखने के लिए किसी योजना की जरूरत दिखाई दे रही है।
2 साल से दूसरे भवन में चल रहा अस्पताल, फिर भी समाधान दूर
पुराने उप स्वास्थ्य केंद्र की हालत खराब होने के बाद पिछले दो वर्षों से स्वास्थ्य सेवाएं महिला स्व-सहायता समूह के भवन में संचालित की जा रही हैं। ग्रामीणों के लिए यह व्यवस्था मजबूरी का दूसरा नाम बन गई है।इलाज की सुविधा बंद न हो, इसलिए वैकल्पिक भवन का सहारा लिया गया, लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह वैकल्पिक व्यवस्था कब तक चलेगी? ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से नए उप स्वास्थ्य केंद्र भवन की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांग सरकारी व्यवस्था के दरवाजे पर दस्तक देते-देते थक चुकी है।
छह बिस्तरों का भवन भी अधूरा, अतिक्रमण बना रोड़ा
बारुला में स्वास्थ्य सुविधा को बेहतर बनाने के लिए छह बिस्तरों वाले अतिरिक्त भवन का निर्माण भी शुरू किया गया था। लेकिन यह भवन भी अब अधूरा पड़ा है। बताया जा रहा है कि अतिक्रमण के चलते निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका।यानी एक तरफ पुराना भवन जर्जर होकर बारिश और जीव-जंतुओं का ठिकाना बन गया, दूसरी तरफ नया भवन अतिक्रमण की उलझन में अधूरा खड़ा है। बीच में फंसे हैं बारुला के ग्रामीण, जिन्हें इलाज के लिए उपलब्ध वैकल्पिक भवन पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
ग्रामीणों का सवाल आखिर कब जागेगा जिम्मेदार विभाग?
ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य केंद्र का नया भवन उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग है। गांव की आबादी के लिए उप स्वास्थ्य केंद्र बेहद जरूरी है, लेकिन भवन की खराब स्थिति के कारण स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर चिंता बनी हुई है। सवाल यही है कि जब उप स्वास्थ्य केंद्र खुद बीमार हो, तो वहां आने वाले मरीजों को स्वस्थ होने की उम्मीद कितनी रखनी चाहिए? क्या सरकारी व्यवस्था में किसी भवन के पूरी तरह जर्जर होने का इंतजार किया जाता है, या फिर उससे पहले ही मरम्मत और नए भवन की व्यवस्था की जाती है?बारुला के ग्रामीण अब आश्वासन नहीं, बल्कि सुरक्षित और स्थायी स्वास्थ्य केंद्र चाहते हैं। जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार विभाग मामले को गंभीरता से लेते हुए पुराने भवन की स्थिति का जायजा ले, नए भवन की व्यवस्था करे और छह बिस्तरों वाले अधूरे भवन के निर्माण में आ रही बाधाओं को दूर करे।
क्योंकि अस्पताल अगर मरीजों को डराने लगे, तो फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की सेहत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।