माओवाद के गढ़ में पहली बार लहराया तिरंगा, जिस पहाड़ी पर गूंजी थीं गोलियां वहीं गूंजा भारत माता का जयघोष ।

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By Sangani

गरियाबंद के कुल्हाड़ीघाट स्थित माटल की पहाड़ी पर आजादी के बाद पहली बार तिरंगा फहराया गया। इसी पहाड़ी पर 11 महीने पहले मुठभेड़ में 10 माओवादी मारे गए थे। पढ़े पूरी ख़बर पैरी टाईम्स पर।

गरियाबंद जिस पहाड़ी पर कभी माओवादियों की बंदूकें गरजती थीं, जहां जंगल की खामोशी को गोलियों की आवाज चीर देती थी और जहां सुरक्षा बलों के जवानों ने मुठभेड़ में माओवादियों को ढेर कर भारत माता की जय के नारे लगाए थे, उसी माटल की पहाड़ी पर आज आजादी के बाद पहली बार तिरंगा शान से लहराया। यह सिर्फ स्वतंत्रता दिवस पर हुआ ध्वजारोहण नहीं था, बल्कि माओवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों की लंबी लड़ाई के बाद बदलते गरियाबंद की एक बेहद भावुक और रोमांचक तस्वीर भी थी।

15 अगस्त के मौके पर गरियाबंद के कुल्हाड़ीघाट इलाके में स्थित माटल की पहाड़ी पर सीआरपीएफ और ई-30 के जवान पहुंचे। पुलिस अधीक्षक वेदव्रत सिरमौर के निर्देश पर जवानों ने पहाड़ी पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। तिरंगा जैसे ही आसमान में लहराया, पूरा इलाका देशभक्ति के रंग में रंग गया। कभी जिस इलाके में माओवादी दहशत का साया माना जाता था, वहीं जवानों के साथ ग्रामीणों ने आजादी का पर्व मनाया।

11 महीने पहले इसी पहाड़ी पर हुई थी मुठभेड़

माटल की पहाड़ी का नाम गरियाबंद के माओवादी विरोधी अभियान में खास महत्व रखता है। करीब 11 महीने पहले 11 सितंबर 2025 में इसी इलाके में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई थी। मुठभेड़ के बाद जवानों ने 10 माओवादियों को मार गिराया था। जिसमें एक करोड़ का एक सीसी मेंबर मनोज भी मारा गया था ऑपरेशन के दौरान पहाड़ी पर भारत माता की जय के नारे गूंजे थे।

आज उसी जगह का दृश्य पूरी तरह बदला हुआ था। हाथों में हथियार लिए जवानों की मौजूदगी जरूर थी, लेकिन इस बार बंदूकें नहीं, बल्कि उनके हाथों में तिरंगा था। गोलियों की आवाज की जगह राष्ट्रभक्ति का माहौल था और मुठभेड़ की यादों वाली पहाड़ी पर स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाया जा रहा था।

दो बड़े ऑपरेशन में ढेर हुए 26 माओवादी

कुल्हाड़ीघाट ग्राम पंचायत का छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ चलाए गए अभियानों में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहां जनवरी और सितंबर 2025 में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच दो बड़े मुठभेड़ अभियान हुए। इन दोनों अभियानों में कुल 26 माओवादियों के मारे जाने की बात सामने आई, जिनमें एक-एक करोड़ रुपये के इनामी माओवादी भी शामिल थे।

यही वजह है कि माटल की पहाड़ी पर तिरंगा फहराया जाना सुरक्षा बलों के लिए भी एक प्रतीकात्मक उपलब्धि माना जा रहा है। जिस इलाके को कभी माओवादियों का प्रभाव क्षेत्र माना जाता था, वहां अब राष्ट्रीय पर्व खुले तौर पर मनाया जा रहा है।

ग्रामीणों ने पहली बार अपनी आंखों से देखा तिरंगा

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भावुक पहलू ग्रामीणों से जुड़ा रहा। सीआरपीएफ और E 30 के जवानों ने गांव के लोगों को तिरंगे बांटे और बच्चों को मिठाइयां खिलाईं। ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने अपने गांव में पहली बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराते हुए देखा है।

गांव के एक बुजुर्ग ने बताया कि वह कई वर्षों से इस इलाके में रह रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी आंखों के सामने पहली बार यहां भारत का तिरंगा फहराते देखा। उनके लिए यह पल सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ऐसा दृश्य था जिसे वे लंबे समय तक याद रखेंगे।

जहां कभी डर था, वहां अब तिरंगे की शान

माटल की पहाड़ी पर हुआ ध्वजारोहण इस बात का संकेत भी है कि कुल्हाड़ीघाट में हालात किस तरह बदल रहे हैं। जिस इलाके में कभी सुरक्षा बलों के लिए अभियान चलाना चुनौती माना जाता था, वहां अब राष्ट्रीय ध्वज के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है।

माटल की पहाड़ी पर लहराता तिरंगा इसलिए भी खास है क्योंकि यह केवल कपड़े का एक ध्वज नहीं, बल्कि डर से भरोसे तक, बंदूक से लोकतंत्र तक और माओवादी प्रभाव से राष्ट्र की मुख्यधारा तक पहुंचते बदलाव का प्रतीक बन गया है।

आज पहाड़ी पर हवा वही थी, जंगल वही था और जमीन भी वही थी। बदला था तो सिर्फ माहौल। जहां 11 महीने पहले गोलियों की गूंज सुनाई दी थी, वहीं आज तिरंगे की छांव में भारत माता की जय का उद्घोष सुनाई दिया। कुल्हाड़ीघाट के इतिहास में स्वतंत्रता दिवस का यह दिन इसलिए दर्ज हो गया कि आजादी के बाद पहली बार माटल की पहाड़ी ने अपने सिर पर भारत का तिरंगा देखा।

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