करोड़ो का बजट गाय कोठे में शिक्षा क्रांति.. 4 साल से अधूरा स्कूल, विभाग सोता रहा ..अब ग्रामीणों के चंदे और श्रमदान से बनेगी पाठशाला ।

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By Sangani

करोड़ो का बजट गाय कोठे में शिक्षा क्रांति गरियाबंद के मैनपुर ब्लॉक के मोतीपानी में 4 साल से स्कूल भवन अधूरा है। करोड़ों के बजट के बीच ग्रामीण चंदा और श्रमदान से स्कूल बना रहे हैं। पढ़े पूरी ख़बर पैरी टाईम्स पर।

गरियाबंद सरकार हर साल ग्रामीण इलाकों में स्कूलों के विकास, भवन निर्माण और बच्चों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं देने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये का बजट खर्च करती है। योजनाएं बनती हैं, बजट जारी होता है और विकास के दावे भी किए जाते हैं। लेकिन गरियाबंद के मैनपुर ब्लॉक के मोतीपानी गांव की तस्वीर इन दावों पर ही सवाल खड़ा कर रही है।

यहां शासकीय प्राथमिक शाला मोतीपानी का भवन करीब चार साल से अधूरा पड़ा है। बच्चों को पढ़ने के लिए उचित भवन नहीं मिल पाया तो ग्रामीणों और पालकों ने आखिरकार खुद ही जिम्मेदारी उठा ली। अब चंदा इकट्ठा किया जा रहा है और ग्रामीण श्रमदान कर अस्थाई स्कूल भवन तैयार करने में जुटे हैं।

करोड़ो का बजट गाय कोठे में शिक्षा क्रांति

करोड़ो का बजट गाय कोठे में शिक्षा क्रांति, लेकिन स्कूल की छत के लिए ग्रामीणों का चंदा

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए हर साल बड़ी-बड़ी योजनाओं के साथ लाखों-करोड़ों रुपये का बजट आता है। स्कूल भवनों का निर्माण, मरम्मत और मूलभूत सुविधाओं को बेहतर करने की बातें होती हैं।

लेकिन मोतीपानी में सवाल यह है कि जब सरकारी बजट मौजूद है, विभाग मौजूद है और प्रशासनिक अमला भी मौजूद है, तो फिर चार साल से अधूरा स्कूल भवन आखिर किसका इंतजार कर रहा है?

शायद विभाग को उम्मीद थी कि एक दिन ग्रामीण खुद ही चंदा इकट्ठा करेंगे और श्रमदान करके स्कूल बना देंगे। अब ग्रामीणों ने यह जिम्मेदारी भी उठा ली है।

गाय के कोठे में पाठशाला, व्यवस्था पर बड़ा सवाल

मोतीपानी में बच्चों की पढ़ाई के लिए गाय के कोठे में पाठशाला संचालित होने की तस्वीर सामने आना व्यवस्था के लिए किसी आईने से कम नहीं है।

एक तरफ सरकारी स्तर पर ग्रामीण शिक्षा को मजबूत करने और बच्चों को बेहतर माहौल देने के दावे किए जाते हैं, दूसरी तरफ जमीन पर बच्चों की पाठशाला के लिए भी पर्याप्त भवन नहीं है।

सवाल यही है कि अगर स्कूल भवन चार साल में पूरा नहीं हो सकता तो क्या विभाग को अब स्कूल की जगह बदलकर गौशाला सह पाठशाला का बोर्ड लगाने की तैयारी करनी चाहिए?

विभागीय लापरवाही पर ग्रामीणों ने दिखाया आईना

स्कूल भवन का निर्माण लंबे समय से अधूरा है, लेकिन अब तक इसे पूरा कराने के लिए प्रभावी पहल कितनी हुई, यह सवाल ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय है।

ग्रामीणों ने इंतजार किया, पालकों ने इंतजार किया और बच्चे भी इंतजार करते रहे। जब इंतजार की सीमा खत्म हुई तो ग्रामीणों ने चंदा जुटाया और खुद श्रमदान शुरू कर दिया।

यानी सरकारी व्यवस्था जहां फाइलों और प्रक्रियाओं में आगे बढ़ती दिखाई देती है, वहीं ग्रामीणों ने फावड़ा और श्रमदान लेकर वास्तविक काम शुरू कर दिया।

बजट आता है, योजनाएं आती हैं, फिर भी हालात क्यों नहीं बदलते?

ग्रामीण स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए हर साल सरकारी खजाने से बड़ी रकम खर्च किए जाने के बावजूद कई जगहों पर बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है।

मोतीपानी का अधूरा भवन इसी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। आखिर बजट का लाभ जमीन तक पहुंचने में इतनी लंबी दूरी क्यों तय करता है?

कागजों में स्कूलों के विकास की तस्वीर कितनी भी खूबसूरत क्यों न हो, असली तस्वीर तब सामने आती है जब बच्चे सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल में पढ़ सकें।

मोतीपानी में फिलहाल तस्वीर उलटी है बजट सरकारी, योजना सरकारी, स्कूल सरकारी… लेकिन स्कूल बनाने की जिम्मेदारी ग्रामीणों की!

प्रशासन की नींद कब टूटेगी?

ग्रामीणों की पहल निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इससे विभाग और प्रशासन की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। बच्चों की शिक्षा और सुरक्षित स्कूल भवन उपलब्ध कराना सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी है।

चार साल से अधूरे पड़े भवन को लेकर अब प्रशासन को गंभीरता दिखानी होगी। यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि निर्माण में देरी क्यों हुई, जिम्मेदारी किसकी है और भवन कब तक पूरा होगा।

ग्रामीणों ने अपना काम किया, अब विभाग की बारी

मोतीपानी के ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर और श्रमदान करके यह साबित कर दिया कि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है। अब सवाल प्रशासन से है।

जब ग्रामीण सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों के लिए स्कूल बनाने में जुट सकते हैं, तो सरकारी विभाग करोड़ों के बजट और पूरे प्रशासनिक तंत्र के बावजूद चार साल पुराने अधूरे भवन को पूरा क्यों नहीं कर पा रहा?

मोतीपानी की कहानी सिर्फ एक स्कूल की बदहाली नहीं, बल्कि उन तमाम सरकारी दावों पर सवाल है, जिनमें ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की बात कही जाती है।

बच्चों के हाथ में किताब होनी चाहिए, स्कूल बनाने का फावड़ा नहीं। अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन सिर्फ निरीक्षण और आश्वासन तक सीमित न रहे, बल्कि अधूरे स्कूल भवन को जल्द पूरा कराकर बच्चों को सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराए।

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