छत्तीसगढ़ में उत्सव स्थापना दिवस पर राज्योत्सव के बीच सरपंच 30 करोड़ के लंबित भुगतान के लिए कटोरा लेकर उतरने को मजबूर, छात्रावास अधीक्षक संघ ने 12 नवंबर को सांकेतिक हड़ताल का ऐलान किया पढ़ें पूरी खबर पैरी टाईम्स पर ।
गरियाबंद छत्तीसगढ़ आज अपना स्थापना दिवस मना रहा है। राज्योत्सव के मंच सजेंगे, उपलब्धियों का बखान होगा और विकास के दावों की गूंज सुनाई देगी। लेकिन इसी उत्सवी माहौल के बीच प्रदेश की एक दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है। यहां जनप्रतिनिधि हों या लोक सेवक, अपनी मांगों और बकाया भुगतान के लिए उन्हें अब आंदोलन का रास्ता अपनाने पर मजबूर होना पड़ रहा है। एक तरफ सरपंच संघ 30 करोड़ रुपये से अधिक की लंबित राशि के भुगतान के लिए कटोरा लेकर सड़क पर उतरने की तैयारी में है, तो दूसरी तरफ छात्रावास अधीक्षक संघ ने भी मांगें पूरी नहीं होने पर हड़ताल का ऐलान कर दिया है। सवाल यही है कि जब व्यवस्था के जिम्मेदार ही अपनी मांगों के लिए आंदोलन करने लगें, तो आम जनता की फरियाद कौन सुनेगा?

छत्तीसगढ़ में उत्सव के बीच छात्रावास अधीक्षक भी आंदोलन की राह पर
इधर छत्तीसगढ़ राज्य स्तरीय छात्रावास अधीक्षक संघ की जिला इकाई गरियाबंद ने भी अपनी लंबित मांगों को लेकर मोर्चा खोल दिया है। संघ ने 30 अक्टूबर को जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि छात्रावास-आश्रमों के संचालन में आ रही समस्याओं, जरूरी सुविधाओं की कमी और कार्य संबंधी व्यवस्थाओं को लेकर लंबे समय से मांग की जा रही है, लेकिन अब तक समाधान नहीं हुआ है।
संघ के अनुसार छात्रावासों में पर्याप्त संसाधनों और आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। ऐसी परिस्थितियों में अधीक्षकों के लिए जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। संघ ने 12 नवंबर को कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल करने की घोषणा की है। साथ ही चेतावनी दी है कि समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो नियमित और प्रभारी अधीक्षक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने को मजबूर होंगे।
राज्योत्सव की चमक के बीच कटोरा लेकर सड़क पर उतरेंगे सरपंच
प्रदेश में सरपंचों की स्थिति भी इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। सरपंच संघ का आरोप है कि 30 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का भुगतान लंबे समय से लंबित है। विकास कार्य कराने वाले पंचायत प्रतिनिधि अब भुगतान के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि अपनी मांगों की ओर शासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए सरपंचों को कटोरा लेकर सड़क पर उतरने की नौबत आ गई है। जिनके हाथों में गांव के विकास की जिम्मेदारी है, वे आज अपनी ही राशि के भुगतान के लिए गुहार लगा रहे हैं। यह तस्वीर पंचायत व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर कई सवाल खड़े करती है।
उत्सव के मंच पर विकास, सड़कों पर मांगों का हिसाब
छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस पर एक तरफ राज्य की उपलब्धियों का उत्सव मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पंचायत प्रतिनिधियों और कर्मचारी संगठनों की नाराजगी व्यवस्था के सामने चुनौती बनकर खड़ी है। सवाल यह नहीं कि राज्योत्सव मनाया जाना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि उत्सव के साथ उन लोगों की समस्याओं का समाधान कब होगा, जो गांवों के विकास से लेकर छात्रावासों में बच्चों की देखरेख तक की जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
आखिर विकास की तस्वीर में इनकी परेशानियों के लिए जगह कब बनेगी? क्योंकि उत्सव के मंच से सुनाई देने वाले विकास के दावों और सड़क पर कटोरा लेकर खड़े सरपंचों के सवालों के बीच की दूरी अब छिपाए नहीं छिप रही है।