छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म 7 माह बाद गरियाबंद के राजाडेरा जंगल से 21 लाख रुपये का नक्सली डंप बरामद,चलपति की पूर्व बॉडीगार्ड समेत दो सरेंडर नक्सली और नव आरक्षक गिरफ्तार, जंगलों में छिपे अन्य डंप पर उठते सवाल पढ़ें पूरी खबर पैरी टाईम्स पर।
गरियाबंद नक्सलवाद के खिलाफ बड़ी-बड़ी सफलताओं और जंगलों में नक्सली नेटवर्क के कमजोर होने के बाद गरियाबंद के राजाडेरा जंगल से बरामद 21 लाख रुपये ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। मैनपुर थाना क्षेत्र के इस जंगल में जमीन के भीतर छिपाकर रखी गई नकदी निकालने पहुंचे दो महिला सरेंडर नक्सलियों और एक नव आरक्षक को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। दोनों महिला आरोपियों ने सुकमा पुनर्वास कैंप में रहने के दौरान अपने पुराने सहयोगी और नव आरक्षक भूतबेड़ा निवासी नोहर मरकाम से संपर्क कर निकालने की योजना बनाई थी बरामद रकम को पुलिस वर्ष 2024 में नक्सली कमांडर चलपति द्वारा छिपाया गया डंप बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब नक्सली संगठन के बड़े चेहरे मारे जा चुके हैं और कई कैडर आत्मसमर्पण कर चुके हैं, तो जंगलों में अब भी ऐसे कितने खजाने दबे हुए हैं?

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म मगर जंगलों में अभी भी मौजूद है नक्सलियों का कैश
इस मामले में गिरफ्तार सिंगे उर्फ रोशनी की भूमिका भी चर्चा में है। पुलिस के मुताबिक, वह एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सली कमांडर चलपति की बॉडीगार्ड रह चुकी है। जबकि बुधरी मुचाकी को सीएनएम दलम की पूर्व कमांडर बताया गया है। चलपति जनवरी 2025 में गरियाबंद के कुल्हाड़ीघाट क्षेत्र में सुरक्षा बलों के साथ हुई बड़ी मुठभेड़ में मारा गया था। उस अभियान में 16 नक्सलियों के मारे जाने की खबर सामने आई थी। इसके बाद सितंबर 2025 में राजाडेरा-मटाल क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने एक और बड़ी कार्रवाई करते हुए 10 नक्सलियों को मार गिराया था। इस मुठभेड़ में एक करोड़ रुपये का इनामी नक्सली मोडेम बालकृष्ण उर्फ मनोज भी मारा गया था। इन दोनों अभियानों ने गरियाबंद के जंगलों में नक्सली नेटवर्क को बड़ा झटका दिया था।
2 साल पुराने डंप में मिले लाखों रुपए ने खड़े किये कई सवाल
राजाडेरा के उसी जंगल क्षेत्र से चलपति के नाम से जुड़ा 21 लाख रुपये का डंप मिलना इस बात की ओर इशारा करता है कि नक्सली संगठन ने अपनी आर्थिक गतिविधियों और संसाधनों को किस तरह गुप्त ठिकानों पर छिपाकर रखा था। पुलिस का दावा है कि यह रकम ठेकेदारों और आम लोगों से कथित अवैध वसूली के जरिए जुटाई गई थी और वर्ष 2024 में जमीन के नीचे छिपाई गई थी। इसमें सबसे बड़ा सवाल यह कि जब छोटे कैटेगिरी की नक्सलियों को इतनी बड़ी राशि के डंप की जानकारी है तो बड़े बड़े कैडर के नक्सलियों ने जंगल में अपनी कितनी आर्थिक विरासत छोड़ रखी है
आत्मसमर्पित नक्सलियों ने नव आरक्षक को भी किया शामिल
इस पूरे घटनाक्रम में तीसरे आरोपी नोहर मरकाम की भूमिका सबसे अहम सवाल बनकर सामने आई है। पुलिस दस्तावेज में उसे नव आरक्षक बताया गया है। मिली जानकारी के अनुसार, नोहर मरकाम पहले नक्सलियों की गतिविधियों की जानकारी पुलिस तक पहुंचाने और मुखबिरी करने में मदद करता था। इसी भूमिका के चलते उसे नव आरक्षक बनाया गया था। ऐसे में सवाल उठता है कि नक्सलियों की गतिविधियों की जानकारी देने वाला व्यक्ति आखिर पुराने नक्सली डंप को निकालने की कोशिश में कैसे शामिल हो गया ?
21 लाख की बरामदगी जंगल में और कितना है कैश ?
लेकिन इस बरामदगी के पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है। 31 मार्च 2026 को केंद्र सरकार ने देश को नक्सलवाद से प्रभावी रूप से मुक्त होने का महत्वपूर्ण पड़ाव बताया था। इसके बावजूद अक्टूबर में जंगल से नक्सली कैश डंप निकल रहा है। क्या नक्सली संगठन ने आत्मसमर्पण से पहले करोड़ों रुपये अलग-अलग जंगलों में छिपाकर रखे थे? क्या सभी कैश डंप की जानकारी सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंची है? क्या कुछ पूर्व नक्सली आज भी छिपी हुई संपत्ति की जानकारी अपने तक सीमित रखे हुए हैं?
नक्सवाद के खात्मे के पूर्व भी जिले में मिले थे कई कैश डंप
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि फरवरी 2026 में गरियाबंद के मैनपुर क्षेत्र के जंगल से ही 46 लाख 31 हजार 500 रुपये नकद और हथियारों का जखीरा बरामद हुआ था। यानी एक ही जिले के जंगलों से कुछ महीनों के भीतर लाखों रुपये के पुराने नक्सली डंप सामने आ चुके हैं।छत्तीसगढ़ सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत पूर्व नक्सलियों को आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण, रोजगार और पात्रता के आधार पर सरकारी सेवा में अवसर देने का प्रावधान है। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि आत्मसमर्पण के बाद पुराने नक्सली नेटवर्क और आर्थिक गतिविधियों की निगरानी किस तरह की जा रही है। खासकर जब इस मामले में एक नव आरक्षक का नाम सामने आया है, तब उसकी नियुक्ति, पृष्ठभूमि और कथित भूमिका की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
शासन से पुनर्वास नीति के तहत मिलनी थी इनामी राशि और कई सुविधाएं
शनिवार को पकड़ी गई दोनों महिला आरोपियों के शासन की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पण करने के बाद भी कथित तौर पर पुराने नक्सली नेटवर्क और छिपी रकम तक पहुंचने की बात सामने आने के बाद नक्सलियों द्वारा दी गई जानकारी को लेकर भी गंभीर बहस शुरू हो गई है । क्या नक्सली शासन के साथ दोहरे मापदंड और दोहरी भूमिका निभा रहे है एक तरफ सरेंडर होकर शासन की ओर से मिलने वाली पुनर्वास नीति का लाभ भी ले रहे है तो वही दूसरी ओर आमजनों से भयादोहन कर वसूली गई लेवी को जंगलो में अपने वाले भविष्य के लिए संजो कर रखा हुआ है ……आखिर कितने और डंप और कितनी राशि जंगलों में नक्सलियों भविष्य संवारने के लिए दबी हुई है ? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन नक्सलियों ने जंगलों में छिपाए गए हथियारों, नकदी और अन्य संसाधनों का कोई पूरा रिकॉर्ड शासन को मुहैया कराया था ?
राजाडेरा के जंगल में 2 साल पुराने डंप में रखे 21 लाख रुपये की बरामदगी अब महज एक कार्रवाई नहीं, बल्कि नक्सली नेटवर्क के बचे हुए आर्थिक ठिकानों की पड़ताल का विषय भी बन चुकी है। अब जरूरत इस बात की है कि जांच एजेंसियां पता लगाएं कि ऐसे और कितने डंप जंगलों में छिपे हैं और उनकी जानकारी अब तक सामने क्यों नहीं आई।
BNS और UAPA की गंभीर धाराओं के तहत दर्ज हुआ मामला
इस पूरे मामले में मैनपुर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308(2), 61(2) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की धारा 17, 18, 20, 38 एवं 40 के तहत अपराध दर्ज किया है। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि आत्मसमर्पण और पुनर्वास के बाद भी आरोपी किस तरह पुराने नक्सली नेटवर्क के संपर्क में थे और इस रकम को निकालने के पीछे उनकी आगे की क्या योजना थी।
गरियाबंद पुलिस अब खंगालेगी इस पूरे मामले का नेटवर्क
तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी और रायपुर जेल शिफ्ट किए जाने के बाद अब पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि आत्मसमर्पण के बाद भी पुराने नक्सली नेटवर्क से उनका संपर्क किस स्तर तक बना हुआ था और जंगल में छिपाई गई इस रकम को निकालने के पीछे आगे की क्या योजना थी। इस कार्रवाई ने नक्सलियों के पुराने आर्थिक नेटवर्क और जंगलों में छिपाए गए डंप की तलाश को लेकर एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान खींचा है।
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