संपादक पैरी टाईम्स 24×7 डेस्क गरियाबंद
गरियाबंद में कागजी विकास के दौर में कांवर एम्बुलेंस का सहारा 17 किमी कांवर पर मरीज को ढोने की मजबूरी पर विधायक जनक ध्रुव का छलका दर्द बोले कागजों में विकास, धरातल पर भेदभाव और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल।
गरियाबंद बधाई हो हम डिजिटल इंडिया के उस दौर में पहुंच चुके हैं जहां गरियाबंद जिले के आदिवासी इलाकों में एम्बुलेंस की जगह अब लकड़ी के हाईटेक कांवर ने ले ली है जी हां मैनपुर ब्लॉक के भालूडिग्गी गांव में विकास की ऐसी गंगा बही कि सड़क ही गायब हो गई और बेचारे ग्रामीणों को मजबूरन 17 किलोमीटर तक मरीज को कंधे पर लादकर सिस्टम की अर्थी निकालनी पड़ी

गरियाबंद में कागजी विकास के दौर में कांवर एम्बुलेंस का सहारा
आजादी के 79 साल बाद भी यहां का प्रशासन इतना एडवांस हो गया है कि उसने आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सड़क ही नहीं बनाई ताकि वे पैदल चलकर अपनी सेहत बना सकें भालूडिग्गी के मन्नू नेताम की किस्मत इतनी बुलंद थी कि उन्हें 17 किलोमीटर तक दुर्गम पहाड़ों और पगडंडियों की सैर करने का मौका मिला वह भी लकड़ी और बांस के बने लग्जरी कांवर में बैठकर क्योंकि सरकारी संजीवनी 108 एक्सप्रेस तो इन रास्तों का नाम सुनकर ही टायर पंक्चर कर लेती है

डिजिटल इंडिया के दौर में आदिम युग की बेबसी और पगडंडियों पर सिसकती स्वास्थ्य व्यव्यवस्था
इस आधुनिक बेबसी को देखकर बिंद्रानवागढ़ विधायक जनक ध्रुव का दर्द छलक पड़ा है विधायक ने सिस्टम पर करारा तंज कसते हुए कहा कि उनके विधानसभा क्षेत्र के दर्जनों गांवों की यही नियति बन गई है उन्होंने कहा कि विधानसभा में चिल्ला चिल्लाकर गला बैठ गया और अफसरों को कागज सौंपते सौंपते स्याही खत्म हो गई लेकिन भाजपा सरकार में विकास केवल कागजों पर सरपट दौड़ रहा है धरातल पर तो सिर्फ पत्थर और कांटे ही बचे हैं
सरकार के विकास के दावों पर भड़के विधायक जनक
विधायक जनक ध्रुव ने सरकार को आइना दिखाते हुए कहा कि बड़े शहरों में चमकती सड़कों के विज्ञापन छप रहे हैं लेकिन वनांचल के आदिवासी आज भी आदिम युग में जीने को मजबूर हैं उन्होंने इसे भाजपा सरकार का भेदभाव बताते हुए कहा कि आंकड़ों के मायाजाल में असली विकास कहीं खो गया है और जनता कांवर ढोने को अभिशप्त है
कुल्हाड़ीघाट से मैनपुर तक का संघर्ष एम्बुलेंस नदारद
युवक और परिजनों का संघर्ष कुल्हाड़ीघाट पहुंचने के बाद खत्म नहीं हुआ और जब सरकारी मदद का अता पता नहीं चला तो परिजनों ने अपनी जेब ढीली कर निजी वाहन किराए पर लिया और मरीज को अस्पताल पहुंचाया जहां से उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया है कुल मिलाकर गरियाबंद की यह तस्वीर उस चमकते छत्तीसगढ़ के चेहरे पर करारा तमाचा है जिसके दावों में तो हवाई जहाज उड़ रहे हैं लेकिन जमीन पर एम्बुलेंस के लिए सड़क तक मयस्सर नहीं है ।
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