गरियाबंद सेवा सेतु शिविर के देवभोग खोकसरा में मंत्री दयालदास बघेल के सामने गोवर्धन मांझी ने सड़क, पुल और अफसरों की मौजूदगी से जुड़े स्थानीय मुद्दे उठाए पढ़े.. पूरी ख़बर पैरी टाईम्स पर।
गरियाबंद जिले के सीमांत देवभोग ब्लॉक स्थित खोखसरा गांव में आयोजित विकासखंड स्तरीय सेवा सेतु शिविर का समापन तो बड़े जोर-शोर से हुआ, लेकिन राजनीतिक मंच का क्लाइमैक्स पूरी तरह आउट ऑफ स्क्रिप्ट हो गया। भाजपा सरकार के इस कार्यकाल के पूरे ढाई साल बीत जाने के बाद पहली बार कोई प्रभारी मंत्री इस अंचल में पैर रखने पहुंचे थे। ग्रामीणों का उत्साह ऐसा था मानो सालों से प्यासे को पानी मिलने वाला हो भीड़ इतनी उमड़ी कि अफसर और पुलिस प्रशासन के पसीने छूट गए।

गरियाबंद सेवा सेतु शिविर लेकिन, उत्साह के इस गुब्बारे से हवा निकलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा।
जब दिल्ली के रिपोर्ट कार्ड से बोर होने लगी जनता प्रभारी मंत्री दयालदास बघेल और क्षेत्रीय सांसद रूपकुमारी चौधरी की मौजूदगी में प्रशासनिक अमले ने पूरी ताकत झोंक रखी थी। ग्रामीण अपने हाथों में समस्याओं के लंबे-चौड़े आवेदन थामे आस लगाए बैठे थे। मंत्री जी ने हर आवेदन पर त्वरित कार्रवाई का ‘पारंपरिक आश्वासन’ तो दे दिया, लेकिन जैसे ही भाषण का दौर शुरू हुआ, बात भटक गई।
मंत्री जी स्थानीय जर्जर सड़कों, अधूरे पुल-पुलियों और डॉक्टरों-शिक्षकों की कमी जैसे बुनियादी मुद्दों को भूलकर केंद्र सरकार की योजनाओं का ढोल पीटने लगे। नतीजा यह हुआ कि मंत्री जी की बातों से ऊबकर भीड़ धीरे-धीरे खिसकने लगी।
गोवर्धन मांझी ने पकड़ा माइक, तो थर्राया सिस्टम..
तभी मंच पर असली ट्विस्ट आया! क्षेत्र के पूर्व संसदीय सचिव गोवर्धन सिंह मांझी ने माइक संभाला और फिर जो हुआ, उसकी उम्मीद शायद मंत्री और अधिकारियों को बिल्कुल नहीं थी। मांझी ने मंत्री जी के सामने ही इलाके का वो दर्द बयां करना शुरू किया, जिसे सरकारी फाइलों में दबाकर रखा जाता है।
उन्होंने क्षेत्र की खस्ताहाल सड़कों, सालों से लटके-अटके पुलों और मूलभूत सुविधाओं की बदहाली का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया। इतना ही नहीं, मांझी ने मंच से उन ‘लापता साहबों’ की पूरी सूची ही पढ़कर सुना दी, जो देवभोग ब्लॉक में पदस्थ तो हैं, पर कभी दफ्तर में दर्शन नहीं देते!
जैसे ही मांझी ने इन गैर-जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई की मांग की, पूरा शिविर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। जो भीड़ मंत्री जी के भाषण पर खिसक रही थी, वह मांझी के इस साहसी तेवर पर जम गई।
सरकारी दावों का महल अक्सर कागजों पर ही सुंदर लगता है, लेकिन जब जनता के बीच खड़े होकर नेताजी जमीनी हकीकत भूल जाएं, तो अपनों का ही माइक सच बोलने के लिए मजबूर हो जाता है।
खोखसरा के इस सेवा सेतु शिविर ने साफ कर दिया कि जनता अब केवल आश्वासनों और भाषणों से बहलने वाली नहीं है। ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद पहुंचे प्रभारी मंत्री जी को देवभोग की जनता ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि राशन और योजनाओं के दावों से पहले उन्हें चलने लायक सड़क और दफ्तर में बैठने वाले अफसर चाहिए।
तालियों ने बताया, जनता को किसकी बात ज्यादा जरूरी लगी
मंत्री के सामने स्थानीय समस्याओं की यह सूची पढ़ी गई तो ग्रामीणों ने तालियों के जरिए समर्थन जताया। राजनीतिक तौर पर देखें तो यह दृश्य अपने आप में काफी कुछ कह गया सरकार के पास योजनाओं की लंबी सूची थी और जनता के पास समस्याओं की।
यानी सेवा सेतु के मंच पर योजनाओं का पुल तो बना, लेकिन स्थानीय मुद्दों की खाई अभी भी दिखाई देती रही।
अब सवाल यही है कि शिविर में दिए गए आवेदनों का कितना और कब तक निराकरण होता है? जिन सड़कों, पुलों और बुनियादी सुविधाओं की शिकायत मंच से उठी, उन पर प्रशासन कब कार्रवाई करता है? और जिन अधिकारियों की मौजूदगी पर सवाल उठाए गए, उनके संबंध में क्या निर्णय होता है?
क्योंकि सेवा सेतु की असली परीक्षा मंच पर भाषण खत्म होने के बाद शुरू होगी। ग्रामीणों ने आवेदन दे दिए हैं, सवाल भी दे दिए हैं अब जवाब फाइल में आता है या सड़क पर, यह देखना बाकी है।
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