1 जब्त मशीन 2 भरोसे और 100 सवाल गरियाबंद में अवैध खनन मामले की जब्त मशीन को लेकर RTI से बड़ा खुलासा। खनिज विभाग की कार्रवाई के बाद तहसीलदार की जांच पर उठे सवाल, क्या जांच सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई?
गरियाबंद कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन गरियाबंद के एक अवैध खनन मामले में लगता है कि कानून के हाथ तो लंबे रहे, लेकिन पकड़ कुछ ज्यादा ही ढीली पड़ गई। वजह भी कम दिलचस्प नहीं है। 15 मार्च 2026 को वारसी ट्रेडर्स के द्वारा कोदोबत्तर में अवैध खनन के आरोप में दो हाईवा और एक चैनमाउंटेन मशीन को जब्त किया गया। जिसमें दोनों हाईवा को जुर्माना करके छोड़ दिया गया था.. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, बल्कि यहीं से शुरू हुई।

1 जब्त मशीन 2 भरोसे और 100 सवाल..RTI के माध्यम से प्राप्त दस्तावेज बताते हैं
पूरे में मामले सबसे बड़ी लापरवाही की शुरुआत हुई कि कथित रूप से जब्त की गई मशीन को गरियाबंद तहसीलदार चितेश देवांगन के द्वारा वारसी कंस्ट्रक्शन के मालिक इरफान वारसी की सुपुर्दगी में छोड़ दिया गया, जिस पर अवैध खनन का आरोप था। कुछ समय बाद मशीन मौके से हटा ली गई। शिकायत होने पर तहसीलदार ने जांच की, लेकिन जांच रिपोर्ट ने सवाल कम और सवालों की संख्या ज्यादा बढ़ा दी।रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि संबंधित व्यक्ति ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए मशीन को मौके से हटाने की बात कही और यह भरोसा दिलाया है कि जब भी प्रशासन को जरूरत होगी, मशीन उपलब्ध करा दी जाएगी।
सुपुर्द की गई मशीन पर कार्यवाही के बदले भरोसा का जवाब
हैरानी की बात यह है कि उपलब्ध दस्तावेजों में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं दिखता कि जांच के दौरान मशीन के वर्तमान स्थान का स्वतंत्र भौतिक सत्यापन किया गया हो।यहीं से पूरे मामले पर लापरवाही के सवाल खुद-ब-खुद शुरू हो जाते है। क्या अब सरकारी जब्ती का नया मॉडल यही है कि मशीन अपने पास रखो… जब बुलाएं तब ले आना?
खनिज विभाग ने कार्रवाई की… फिर क्या सब कुछ सिर्फ फाइलों तक सिमट गया?
RTI से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि खनिज विभाग की प्रारंभिक कार्रवाई के बाद शासन के एक और सेवक ने भी अपनी जिम्मेदारी निभाने की औपचारिकता पूरी कर ली। शिकायत पर जांच तो हुई, लेकिन जांच का केंद्र यह नहीं रहा कि मशीन आखिर वर्तमान में कहां है, बल्कि यह रहा कि आरोपी ने भरोसा दिलाया है कि जरूरत पड़ने पर मशीन प्रस्तुत कर देगा।ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सरकारी जांच अब दस्तावेजों और भौतिक सत्यापन से ज्यादा भरोसे पर चलने लगी है?
जिम्मेदारी तय करने के बदले जिम्मेदारी से ही इतिश्री
इस पूरे मामले में गरियाबंद तहसीलदार चितेश देवांगन ने जिम्मेदारी तय करने के बजाय जांच की फाइल पर औपचारिकता पूरी कर इतिश्री कर ली गई? जब्ती हुई… लेकिन निगरानी किसकी थी?यदि मशीन वास्तव में जब्त थी तो वह मौके से कैसे हट गई? यदि हटाने की अनुमति थी तो उसका आदेश कहां है? यदि अनुमति नहीं थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि मशीन हटा दी गई थी तो जांच अधिकारी ने उसके वर्तमान स्थान का सत्यापन क्यों नहीं किया?ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी तक दस्तावेजों में दिखाई नहीं देता। पूरे मामले में खनिज विभाग और राजस्व का एक ही रटा रटाया जवाब है कि मशीन का मामला कोर्ट में चल रहा है लेकिन सवाल यह है जब मशीन है नहीं तो कोर्ट में क्यों चल रहा है ।
आम आदमी पर नियम सख्त, मगर करोड़ों की मशीन पर भरोसा?
एक ओर जहां आम नागरिक किसी सरकारी आदेश का मामूली उल्लंघन कर दे तो नोटिस और कार्रवाई में देर नहीं लगती। लेकिन यहां कथित रूप से जब्त मशीन अपनी जगह बदल लेती है और पूरी जांच का निष्कर्ष एक भरोसे पर टिक जाता है कि जरूरत पड़ेगी तो मशीन उपलब्ध करा दी जाएगी। यदि यही व्यवस्था है तो फिर जब्ती की कानूनी प्रक्रिया, सुपुर्दगी की शर्तें और प्रशासनिक निगरानी का उद्देश्य क्या रह जाता है?
अब जवाब किसे देना होगा?
कानूनी जानकारों का मानना है कि जब किसी मशीन को जब्त किया जाता है तो उसकी उपलब्धता और सुरक्षा सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी होती है। यदि मशीन सुपुर्दगी में दी जाती है तो उसकी शर्तों का पालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। ऐसे में यदि मशीन बिना स्पष्ट अनुमति स्थानांतरित हुई है तो यह स्वतंत्र जांच का विषय बन सकता है।
अब यह मामला केवल एक मशीन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का बन चुका है।
यदि कल न्यायालय, खनिज विभाग या कोई उच्च अधिकारी मशीन को तत्काल प्रस्तुत करने का आदेश दे और मशीन उपलब्ध न हो, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?RTI से सामने आए दस्तावेज कई गंभीर सवाल छोड़ रहे हैं। अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होगी, मशीन का वास्तविक भौतिक सत्यापन कराया जाएगा और यदि प्रक्रिया में कहीं लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय की जाएगी, या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में औपचारिकता पूर्ण लिखकर बंद कर दिया जाएगा।
कार्यवाही में हुई लापरवाही ने छोड़े कई सवाल
गरियाबंद खनिज और राजस्व विभाग ने इस पूरे प्रकरण में शुरुवात से नियमों को दरकिनार किया सबसे पहले मशीन को अवैध खननकर्ता के सुपुर्द कर दिया न मशीन में सील लगाई न मशीन को थाने भिजवाने का कार्य किया जबकि मौके पर मौजूद दोनों हाईवा को कार्यवाही के बाद तत्काल थाने भेजा गया था इसके बाद मशीन मौके से हटाने की शिकायत होने पर तहसीलदार मौके पर गए जरूर और खानकर्ता के जवाब को कागजों पर उतार कर ले आए मगर यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि वर्तमान में मशीन कहा पर सुरक्षित रखी गई है और रखी भी गई है या नहीं और जब इस मामले में उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने पूरी जिम्मेदारी से कार्यवाही की है । वैसे इनके कार्यकाल के दौरान किसी दूसरे के आधार कार्ड से किसी दूसरे व्यक्ति ने रजिस्ट्री भी करवा ली थी जो मामला अभी सुर्खियों में है चितेश देवांगन उस वक्त अमलीपदर तहसील में पंजीयक थे । हालांकि पंजीयक का कार्य केवल रजिस्ट्री करना होता है न कि जांच करना लेकिन फिर भी इस मामले को लेकर राजस्व विभाग की कार्यशैली पर सवाल तो उठ ही रहे है
मशीन का एक माह का किराया लगभग 3 लाख प्रतिमाह है
जो चैन माउंटेन मशीन मौके से गायब है उसका प्रति माह किराया लगभग 3 लाख प्रति माह है और मशीन मार्च में ही हटा दी गई है इस मामले खनिज विभाग ने RTI से जो जानकारी दी है उसके अनुसार मशीन का मामला अभी भी पेंडिंग है और अगर मशीन मौके पर रहती तो इसका किराया वर्तमान में 9 से 12 लाख हो जाता मगर दोनों विभागों की मेहरबानी ने अवैध खनन कर्ता को इससे राहत दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी अब ये मेहरबानी क्यों और किस लिए कितने वजन से हुई है यह सवाल बना हुआ है ।