गरियाबंद के भगवान का गजब प्रशासन में महिला शौचालय की कुंडी तक नहीं लगती पुरुषों के प्रवेश की शिकायत और गंदगी ने प्रशासन पर सवाल खड़े किए,60 से 65 हजार की कथित सफाई राशि भी चर्चा में पढ़े पूरी खबर पैरी टाईम्स पर।
गरियाबंद कहते हैं भगवान सब देखता है। लेकिन गरियाबंद संयुक्त जिला कार्यालय की हालत देखकर लगता है कि यहां के भगवान की नजर शायद सरकारी फाइलों से बाहर निकल ही नहीं पा रही, जिले के कलेक्टर का नाम भगवान सिंह उइके है और उनके प्रशासनिक साम्राज्य के सबसे अहम भवनों में शामिल संयुक्त जिला कार्यालय के शौचालय गंदगी में डूबे हैं, दीवारें गुटखे की पीक से सरकारी लालिमा ओढ़ चुकी हैं और महिला शौचालय की कुंडी तक नहीं लग रही जो पूरी व्यवस्था का मुंह चिढ़ा रही है।
साहब… जिले को स्वच्छ बनाने से थोड़ा वक्त मिले तो अपने दफ्तर में भी झांक लीजिए। क्योंकि यहां स्वच्छ भारत मिशन शायद नाक पर रुमाल रखकर अपनी ही सरकारी फाइल खोज रहा है।

गरियाबंद के भगवान का गजब प्रशासन 30 से 32 विभागों का दफ्तर, महिला टॉयलेट की कुंडी व्यथा
गरियाबंद संयुक्त जिला कार्यालय में करीब 30 से 32 सरकारी विभाग संचालित होते हैं। दर्जनों बड़े अधिकारी यहां बैठते हैं। महिला अधिकारी और कर्मचारी भी बड़ी संख्या में काम करती हैं। यहीं से जिले को व्यवस्था, अनुशासन और नियमों का ज्ञान बांटा जाता है। मगर महिला शौचालय की एक अदद कुंडी लगवाने में शायद प्रशासन की पूरी मशीनरी हांफ गई है एक महिला अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि महिला शौचालय के दरवाजे की कुंडी नहीं लगती है। उनका कहना है कि कई बार पुरुष भी महिला शौचालय में चले जाते हैं।
अब प्रशासन बताए क्या कुंडी लगाने के लिए भी बैठक होगी? समिति बनेगी? प्रस्ताव तैयार होगा? फाइल चलेगी? या फिर महिला कर्मचारियों को तब तक दरवाजे के बाहर एक-दूसरे की पहरेदारी करनी होगी?
यह मजाक नहीं, महिला कर्मचारियों की निजता और गरिमा से जुड़ा गंभीर मामला है। लेकिन शायद व्यवस्था को गंभीर होने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार है।
गुटखे की पीक से सरकारी वॉल पेंटिंग, वॉश बेसिन ने भी छोड़ी सफेदी
संयुक्त कार्यालय की दीवारों पर जगह-जगह गुटखे की पीक के निशान दिखाई देने की शिकायत है। शौचालयों में गंदगी, खाली पाउच और बदहाल वॉश बेसिन सफाई व्यवस्था की असली रिपोर्ट कार्ड दिखा रहे हैं। विडंबना देखिए इसी कार्यालय में बैठने वाले अधिकारी जिलेभर को स्वच्छता का पाठ पढ़ाते हैं।
गांव गंदा मिला तो सचिव को नोटिस..
नगर में कचरा दिखा तो जिम्मेदार अधिकारी को निर्देश..
सड़क किनारे गंदगी मिली तो समीक्षा बैठक..
लेकिन अपने दफ्तर की दीवार गुटखे से रंग जाए तो शायद सरकारी आंखों में अचानक तकनीकी खराबी आ जाती है।
दिया तले अंधेरा पुरानी कहावत है साहब, गरियाबंद में तो भगवान के दफ्तर की ट्यूबलाइट के नीचे भी अंधेरा पसरा है
2 हजार प्रति विभाग..आखिर 60 से 65 हजार की कथित सफाई जाती कहां है? अब इस गंदगी के बीच सबसे दिलचस्प सरकारी गणित भी सुन लीजिए, कार्यालय के ही सूत्रों का दावा है कि संयुक्त कार्यालय में प्रत्येक विभाग से सफाई के नाम पर करीब 2 हजार प्रतिमाह लिए जाते हैं। 30 से 32 विभागों का हिसाब लगाया जाए तो रकम करीब 60 हजार से 65 हजार महीने तक पहुंचती है। हालांकि, Pairi Times 24×7 इस कथित वसूली की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता ।
लेकिन साहब, सवाल पूछना तो पत्रकारिता का काम है
यदि पैसा लिया जा रहा है तो आदेश कहां है? पैसा किस खाते में जाता है? किसके पास हिसाब है? सफाई कौन करता है? और 60 से 65 हजार की कथित मासिक सफाई के बाद भी शौचालय में कुछ सेकंड खड़ा होना मुश्किल क्यों है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि सफाई सिर्फ कागजों में इतनी चमकदार है कि जमीन पर उतरते-उतरते उसकी चमक गायब हो जाती है?
जिले भर में स्वच्छ भारत का ज्ञान बांटने वालों के घर ही स्वच्छता लापता ।
गरियाबंद में स्वच्छ भारत मिशन पर बैठकें होती हैं। अधिकारी भाषण देते हैं। निर्देश जारी करते हैं। तस्वीरें खिंचती हैं। स्वच्छता का संदेश सोशल मीडिया और सरकारी प्रेस नोट तक पहुंचता है।
बस सफाई संयुक्त जिला कार्यालय के शौचालय तक नहीं पहुंच पा रही! लगता है स्वच्छता ने भी कार्यालय का रास्ता पूछा होगा और गुटखे से रंगी दीवार देखकर वापस लौट गई होगी।
भगवान सब देखता है मगर संयुक्त कार्यालय कब दिखेगा साहब?
अब सवाल सीधे कलेक्टर भगवान सिंह उइके से है। महिला शौचालय की टूटी कुंडी कब लगेगी? महिला शौचालय में पुरुषों के प्रवेश की शिकायत की जांच कौन करेगा? गुटखा थूककर सरकारी भवन को रंगने वालों पर कार्रवाई कब होगी? और 60 से 65 हजार की कथित मासिक सफाई राशि का हिसाब कौन बताएगा?
साहब, जिले की स्वच्छता देखने के लिए लंबा दौरा जरूरी नहीं।
बस अपने कार्यालय की कुर्सी से उठिए… संयुक्त कार्यालय के शौचालय तक हो आइए।
शायद वहां पहुंचकर पता चले कि स्वच्छ भारत मिशन की असली परीक्षा गांव की गलियों में नहीं, बल्कि प्रशासन के अपने दरवाजे के पीछे फेल हो रही है।
और तब जनता शायद यही कहेगी
भगवान के घर देर है मगर अंधेर नहीं… यह कहावत गरियाबंद में अपडेट हो चुकी है यहां भगवान के दफ्तर में अंधेर भी है, गुटखे की पीक भी है और सफाई का कथित 60 से 65 हजार वाला रहस्य भी ।