गरियाबंद शिक्षक भर्ती घोटाला.. 20 साल पुराना भर्ती जिन्न, रिटायरमेंट से 6 महीने पहले जागे भगवान.. अब होगा इंसाफ या फिर वही पुरानी कहानी ?

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By Sangani

गरियाबंद शिक्षक भर्ती घोटाला कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने मैनपुर में वर्ष 2005-2007 की शिक्षाकर्मी भर्ती में कथित फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र की जांच के आदेश दिए हैं। आदेश के बाद जांच की टाइमिंग और कार्रवाई को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं पढ़ें पूरा मामला पैरी टाईम्स पर।

गरियाबंद/मैनपुर सरकारी फाइलों की भी अपनी किस्मत होती है। कुछ फाइलें धूल खाते-खाते इतिहास बन जाती हैं, तो कुछ अचानक ऐसे खुलती हैं कि पूरे जिले की राजनीति और प्रशासन में हलचल मच जाती है। मैनपुर की वर्ष 2005 से 2007 के बीच हुई शिक्षाकर्मी भर्ती की फाइल भी कुछ ऐसी ही है, जो करीब 20 साल में कई बार चर्चा में आने के बाद अब एक बार फिर से फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने मंगलवार को आयोजित टीएल (TL) बैठक के दौरान जनपद पंचायत मैनपुर को निर्देश दिए कि वर्ष 2005 से 2007 के बीच कथित फर्जी दिव्यांग (विकलांग) प्रमाण पत्र एवं अन्य फर्जी दस्तावेजों के आधार पर चयनित शिक्षाकर्मियों की सूची दो दिवस के भीतर उपलब्ध कराई जाए। साथ ही स्पष्ट किया गया कि यदि जांच में फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी प्राप्त करने की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

गरियाबंद शिक्षक भर्ती घोटाला

गरियाबंद शिक्षक भर्ती घोटाला 20 साल से उठता है मुद्दा, फिर क्यों नहीं पहुंचा अंजाम तक?

इस आदेश के सामने आते ही जिले में चर्चा सिर्फ जांच की नहीं, बल्कि उसकी टाइमिंग की भी शुरू हो गई है। सवाल यह उठ रहे हैं कि जिस मामले की चर्चा पिछले दो दशकों से समय-समय पर होती रही, उस पर अब जाकर इतनी सक्रियता क्यों दिखाई गई?स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई नया मुद्दा नहीं है। पिछले 20 वर्षों में कई बार जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और अधिकारियों के स्तर पर इस कथित भर्ती घोटाले को उठाया गया। हर बार कार्रवाई के दावे हुए, लेकिन मामला कुछ समय बाद ठंडे बस्ते में चला गया।

जांच से ज्यादा चर्चा ‘पैटर्न’ की

सूत्रों के हवाले से जिले में वर्षों से एक चर्चा चलती रही है कि जब भी यह मुद्दा उठता है, तो कथित रूप से भर्ती प्रक्रिया से जुड़े कुछ लोग सक्रिय हो जाते हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं, लेकिन इनके समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। यही कारण है कि हर बार जांजांच से ज्यादा चर्चा पैटर्न की घोषणा के बाद लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या इस बार मामला अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंचेगा।

रिटायरमेंट से पहले बड़ा फैसला, अब उम्मीदें भी बड़ी

दिलचस्प संयोग यह भी है कि कलेक्टर भगवान सिंह उइके के सेवानिवृत्त होने में लगभग छह माह का समय शेष बताया जा रहा है। ऐसे समय में इस बहुचर्चित मामले की जांच के आदेश ने प्रशासनिक गलियारों के साथ-साथ आम लोगों का ध्यान भी खींच लिया है।अब जिले की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस बार जांच केवल सूची मंगाने तक सीमित रहेगी या फिर दस्तावेजों का सत्यापन कर दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध वास्तविक कार्रवाई भी होगी।

लोगों की नजर अब कार्रवाई पर

फिलहाल प्रशासन ने संबंधित अभिलेख दो दिन के भीतर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। आगे की कार्रवाई जांच रिपोर्ट और दस्तावेजों के परीक्षण पर निर्भर करेगी।करीब दो दशक से चर्चाओं में रहे इस मामले में अब जनता का सबसे बड़ा सवाल यही है क्या इस बार सचमुच फर्जीवाड़े का पर्दाफाश होगा, या फिर 20 साल पुराना इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा?

सूत्रों के हवाले से बनी खबर..

इस खबर में सूत्रों से जुड़े दावों का उल्लेख उसी रूप में किया गया है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल किसी भी शिक्षाकर्मी को दोषी घोषित नहीं किया गया है। जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक जांच के बाद ही सामने आएंगे।

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