गरियाबंद पशु विभाग की संवेदनहीनता ने ली बेजुबान की जान, 40 रुपये की दवा के अभाव में 6 घंटे तड़पा बछड़ा ।

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By Sangani

गरियाबंद पशु विभाग की बड़ी लापरवाही, मात्र 40 रुपये की दवा की कमी बताकर डॉक्टरों ने नहीं किया इलाज, 6 घंटे तक तड़पने के बाद बछड़े ने तोड़ा दम,पढ़ें पूरी खबर पैरी टाइम्स पर ।

गरियाबंद जिला मुख्यालय में सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और लापरवाही का एक ऐसा चेहरा सामने आया है, जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया है। पशु चिकित्सा विभाग की घोर लापरवाही के चलते एक बेजुबान बछड़े को अपनी जान गंवानी पड़ी, विडंबना यह है कि लाखों रुपये का सरकारी बजट और भारी-भरकम वेतन पाने वाले अमले के पास एक छोटे से उपचार के लिए चंद रुपये की दवा उपलब्ध नहीं थी, जिसके कारण वह बेजुबान घंटों तड़पता रहा और अंततः दम तोड़ दिया।

गरियाबंद पशु विभाग

गरियाबंद पशु विभाग की संवेदन-हीनता से बेजुबान की मौत

पूरा मामला गरियाबंद फॉरेस्ट विभाग परिसर का है, जहाँ सोमवार सुबह एक बछड़ा भीषण गर्मी और लू के कारण बेसुध अवस्था में पड़ा मिला। स्थानीय नागरिकों ने जब बछड़े की दयनीय हालत देखी, तो तुरंत इसकी सूचना पशु विभाग को दी। सुबह करीब 7 बजे डॉक्टरों की एक टीम मौके पर पहुंची भी, लेकिन उन्होंने केवल प्राथमिक उपचार की औपचारिकता पूरी की और कुछ मामूली दवाएं देकर वहां से चलते बने।


जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया और गर्मी बढ़ी, बछड़े की स्थिति और भी बिगड़ने लगी। वहां मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों ने जब देखा कि बछड़े की हालत में सुधार नहीं हो रहा है, तो उन्होंने दोबारा पशु चिकित्सकों को फोन लगाया और उनसे आकर सघन उपचार करने की गुहार लगाई। लेकिन इस बार जो जवाब मिला, वह सिस्टम की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा था।

6 घंटे तक फॉरेस्ट विभाग परिसर में तड़पता रहा बछड़ा, डॉक्टरों ने झाड़ा पल्ला

डॉक्टरों ने यह कहते हुए दोबारा आने से पल्ला झाड़ लिया कि उनके पास दवाइयों की कमी है और स्टॉक खत्म हो चुका है।
महज 30 से 40 रुपये की दवा के लिए विभाग ने उस बेजुबान को उसके हाल पर छोड़ दिया। लगभग 6 घंटे तक वह बछड़ा पथराई आंखों से मदद की उम्मीद में तपती जमीन पर तड़पता रहा। अंत में, सिस्टम की इस क्रूरता के आगे वह हार गया और उसकी मौत हो गई।

लाखों का बजट और लाखों की तनख्वाह, फिर भी 40 रुपये की दवा के लिए तरस गया सिस्टम

इस घटना ने जिला मुख्यालय की चिकित्सा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। सवाल यह उठता है कि जिस विभाग को पशुओं के संरक्षण के लिए लाखों का बजट मिलता है, क्या उनके पास आपात स्थिति के लिए जीवनरक्षक दवाएं भी नहीं होतीं? क्या डॉक्टरों की जिम्मेदारी केवल औपचारिकता तक सीमित है? नगर की जनता में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है और लोग अब यह पूछ रहे हैं कि इस बेजुबान की मौत का असली गुनहगार कौन है वे डॉक्टर जो फोन पर बहाने बनाते रहे या वह विभाग जो संसाधनों के अभाव का रोना रोता है।

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