गरियाबंद जनपद पंचायत में महिला स्व-सहायता समूह के लिए बनी बिहान कैंटीन महीनों से बंद है। भवन में सामान का गोदाम बना दिया गया है, बिना किराया इस्तेमाल किया जा रहा है जबकि बाहर शराब की खाली बोतलें पड़ी हैं। पढ़ें पूरी रिपोर्ट पैरी टाईम्स पर।
गरियाबंद सरकारी योजनाओं की दुनिया भी बड़ी दिलचस्प होती है। कागजों में वे महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाती हैं, मंचों पर उनके गीत गाए जाते हैं और भाषणों में उन्हें सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार बताया जाता है। लेकिन जब जमीन पर पहुंचिए तो कई बार तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। गरियाबंद जनपद पंचायत परिसर में छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ के तहत महिला स्व-सहायता समूह के लिए बनाई गई कैंटीन इसका ताजा उदाहरण बन गई है। जिस भवन में चाय की खुशबू, नाश्ते की रौनक और महिलाओं की आजीविका की आवाज सुनाई देनी थी, वहां आज बड़े-बड़े कार्टनों ने अपना स्थायी डेरा जमा लिया है। महीनों से बने इस गोदाम का कोई किराया नहीं लिया जा रहा ऐसा लग रहा है कि महिलाओं की कमाई की जगह अब सामान की रखवाली ज्यादा जरूरी हो गई है।

गरियाबंद जनपद पंचायत में महिलाओं को रोजगार देने वाला बिहान कैंटीन बना गोदाम
विडंबना देखिए कि सरकारी योजनाओं में महिला समूहों को सरकारी दफ्तरों कलेक्टोरेट, जिला पंचायत और जनपद पंचायत में कैंटीन संचालन की प्राथमिकता देने की बात कही जाती है। उद्देश्य साफ है कि महिलाओं को नियमित आय का साधन मिले। लेकिन गरियाबंद में यही कैंटीन महीनों से बंद पड़ी है और भवन गोदाम में तब्दील हो चुका है।
जनपद परिसर में फैली शराब की बोतलों की तस्वीरें भी यही सवाल पूछ रही हैं
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। कैंटीन भवन के ठीक बाहर का दृश्य और भी चौंकाने वाला है। परिसर में गंदगी फैली हुई है और बीयर व शराब की खाली बोतलें बिखरी दिखाई देती हैं। यह दृश्य किसी सार्वजनिक सरकारी कार्यालय की बजाय किसी उपेक्षित स्थान का आभास कराता है। कि आखिर जिस परिसर से विकास योजनाओं की निगरानी होती है, वहां स्वच्छता और व्यवस्था की निगरानी कौन करेगा?
सीईओ बोली सफाई कॉम्प्लेक्स वाले करवाएंगे ?
जब इस पूरे मामले में जनपद पंचायत गरियाबंद की मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) नम्रता शर्मा से बात की गई तो उन्होंने बताया कि पहले जिस महिला स्व-सहायता समूह द्वारा कैंटीन संचालित की जा रही थी, उसने संचालन बंद कर दिया। इसी वजह से कैंटीन लंबे समय से बंद है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में नए महिला समूह की तलाश की जा रही है। समूह का चयन होते ही कैंटीन का संचालन फिर से शुरू कराया जाएगा। वहीं कैंटीन परिसर के बाहर पड़ी शराब और बीयर की खाली बोतलों के संबंध में पूछे जाने पर सीईओ ने कहा कि जिसके द्वारा वहां सामान रखा गया है, उसी के माध्यम से सफाई भी कराई जाएगी।
सवाल सिर्फ कैंटीन का नहीं, सोच का भी है
यह सवाल केवल एक बंद कैंटीन का नहीं है। सवाल उस सोच का भी है जिसमें महिलाओं के रोजगार के लिए बने भवन का उपयोग किसी और काम में होने लगता है और महीनों तक किसी को इसकी चिंता नहीं होती। यदि नया समूह नहीं मिला था तो क्या भवन को अस्थायी गोदाम बनाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था? क्या महिला समूहों की तलाश महीनों तक पूरी नहीं हो सकी? और यदि परिसर में शराब की खाली बोतलें पड़ी थीं तो उनकी सफाई के लिए किसी जिम्मेदार अधिकारी ने पहल क्यों नहीं की?
ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब केवल औपचारिक बयान से नहीं, बल्कि कार्रवाई से मिलेगा।
अब इंतजार बिहान का नहीं, सुबह का है
विडंबना यह है कि इस योजना का नाम बिहान यानी नई सुबह है, लेकिन गरियाबंद में यह सुबह फिलहाल बंद दरवाजे के पीछे कैद दिखाई दे रही है। महिलाओं की आजीविका का केंद्र गोदाम बन गया है और बाहर बिखरी शराब की बोतलें सरकारी परिसर की तस्वीर बयां कर रही हैं। अब देखना होगा कि नया महिला स्व-सहायता समूह कब तक चयनित होता है, कैंटीन दोबारा कब शुरू होती है और यह भवन फिर से रोजगार का केंद्र बनता है या कार्टनों का स्थायी पता बना रहता है।
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